आधार निवेश का सम्मोहन

  १  विरोध में जीवन  मृत्यु में संगम  २  आक्रोश का हल  जीवन है सफल  ३  मर्यादा की लड़ाई  मुसीबतों की परछाई  ४  प्रयासों से परिवर्तन  जीवन के मूल्य चिंतन  ५  ऊर्जा की निधि  सम्मान की परिधि  ६  शब्दों के मेल  कर्मों के जेल  ७  विचार परिवार का सम्मलेन  आधार निवेश का सम्मोहन  ८  एक सफल जीवन  छुपा हो केवल चिंतन  ९  न हो कोई अभिलाषा  जीवन की परिभाषा  दुःख में घोर आशा 

बच्चन विशेष --- क्या भूलूँ क्या याद करूँ , जीवनी बच्चन की और कुछ अनुभव


बच्चन विशेष 

बच्चन को कौन नहीं जानता , उनकी मधुशाला आज भी लोगो के ज़ुबाँ पर है। मधुशाला से बच्चन को जो ख्याति प्राप्त हुई ,वह आज भी कायम है
कभी कभी मैं सोचता हूँ कि  किसी पुस्तक का असर इतना कैसे हो सकता है , १९३३ में पहली बार बच्चन ने खुद ही यह पुस्तक बाज़ार में निकाली थी ,मूल्य मात्र १ रूपये , पॉकेट किताब के रूप में।  बहुत तंग आकर उन्होंने यह कदम उठाया था , जैसा  की वो इसका ज़िक्र अपनी किताब ,क्या भूलूँ क्या याद करूँ  में भी करते हैं ।  

उनकी जीवनी पढ़ने की आशा मुझे कई सालों  से थी और मैंने  उनकी जीवनी का कुछ अंश पढ़ा भी था, मगर पूरा नहीं कर पाया था और तभी से  लगता था की यह किताब एक दिन ज़रूर पढूंगा। 

क्या भूलूँ क्या याद करूँ

जैसा मैंने सोचा था , यह पुस्तक उससे भी कहीं बेहतर है। अपने जीवन के कई अंश , अनुभव ,मनोदशा, भाव और घटनाओं का उल्लेख जिस तरह बच्चन ने किया है, लगता है आप उनके साथ उनका जीवन फिर से जी रहे रहे हो। और ये ताज्जुब की बात नहीं की मैंने यह किताब कुछ ही दिनों में पढ़ डाली। 

इस पुस्तक को पढ़ने के पीछे और भी कई कारण थे ,जैसे की हिंदी की ओर आना, बहुत सालों से कोई हिंदी की पुस्तक भी मैंने नहीं पढ़ी थी।  सच तो यह है की पढ़ना तो हमेशा से ही चाहता था, मगर कुछ अपने अंदर का ही मुझे हर बार रोकता था।

मैं हर बार यही सोचता की कहीं अपना समय व्यर्थ तो नहीं गवां रहा , मगर अब जाकर अनुभव हुआ कि मैं कितना गलत था। आखिर कोई गलत कैसे हो सकता है जब वह वो कार्य कर रहा है जो उसे अच्छा लगता है, और समय व्यर्थ तो हमने इतना किया है की उसकी गणना में एक जीवन और मिले तो भी कम है। 

बच्चन जीवन 

आज़ादी में उनकी भागीदारी, उनके गीतों का प्रचलन , गाँधीजी से मिलन , बावन शहरो का भ्रमण , मीलों पैदल यात्रा , घर पर क़र्ज़ और क़र्ज़ के लिये दो दो टूशन और न जाने क्या क्या , बच्चन ने अपने जीवन में क्या नहीं देखा। 

पहली पत्नी का देहांत उनके जीवन का  बहुत दुःखद  पल था , मगर उस दौर में भी बच्चन ने अपना हिम्मत कायम रखा और आगे बढे , जीवन जिया।  सही शब्दों में अगर कहूँ , तो बच्चन कभी रुके नहीं।  जैसे भी परिस्थिति हो, उसका सामना किया और जीते।  

अगर मैं कुछ सीख सकता हूँ , उनके जीवनी से तो वह यही होगा, कि कोई भी मनुष्य हो और किसी भी विधा में हो , उसके पास कोई भी परेशानियाँ आयें ,उसे रुकना नहीं चाहिए।  रुकने का नाम जीवन नहीं है 

अभी दो पुस्तकें और है, जिनको पढ़ना है मुझे , कोशिश रहेगी की जल्दी हीं पढ़ूँ। 

अनुभव जीवन के 

इतने वर्षो बाद भी उनकी रचनायें और कृतियाँ बिलकुल नयी और ताज़ा लगती है , इसका एक  कारण मैं उनमे छिपे भावनाओं और अनुभवों को मानता हूँ   

जो बातें उनकी है , वह मनुष्य आज भी अनुभव करता है , और शायद हमेशा करेगा क्योकि वह हर किसी के जीवन से जुड़ीं हैं।  और जैसा की बच्चन ने खुद इस किताब  में भी कहा है कि वह जीवन के कवि है , जो उन्होंने अपने जीवन में देखा , जाना , महसूस किया , वही  उनकी  रचनाओं में है।  वह अपनी रचनाओं से परे नहीं है , वह उन्ही में हैं ।  
मैं मानता हूँ कि बच्चन के लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि उनके गीतों को हम गुनगुनाये और सुने।  
और अगर हमे ये हिम्मत देती है, या हमारे वर्तमान परिस्थिति में मदद करती हैं,  तो समझिये की उनका रचना का उद्देश्य पूरा हो गया।  
जैसे कि वो खुद चाहते भी थे। बड़े ही निर्भीक रूप से बच्चन ने अपना अनुभव हमारे साथ बाँटा है , और यह हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम उससे कुछ सीखे और दूसरों को भी सीखायें। 

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