आधार निवेश का सम्मोहन

  १  विरोध में जीवन  मृत्यु में संगम  २  आक्रोश का हल  जीवन है सफल  ३  मर्यादा की लड़ाई  मुसीबतों की परछाई  ४  प्रयासों से परिवर्तन  जीवन के मूल्य चिंतन  ५  ऊर्जा की निधि  सम्मान की परिधि  ६  शब्दों के मेल  कर्मों के जेल  ७  विचार परिवार का सम्मलेन  आधार निवेश का सम्मोहन  ८  एक सफल जीवन  छुपा हो केवल चिंतन  ९  न हो कोई अभिलाषा  जीवन की परिभाषा  दुःख में घोर आशा 

चित्रलेखा परिणाम ज्ञान

कल क्या हुआ ,और कल क्या होगा , यह कुछ लोग ही जानते हैं ,मगर इस जानकारी का वह करे क्या यह नहीं जानते हैं ,फिर कुछ लोग उनके साथ जुड़ते हैं और बताते हैं कि वह जानते हैं इस जानकारी का क्या करना है ,फिर दोनों लोग मिल कर खिचड़ी बना लेते हैं। और सो जाते हैं। आधुनिक ढाँचे में तकनीक के मदद से जनता तक कैसे संवाद पहुँचाना है ,यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है ,मगर यह महत्वपूर्ण केवल राजनितिक दल के लिए है ,क्यूँकि इसका लाभ उन्हें आगे ले जा सकता है वहीँ इसके बुरे परिणाम गुमनामी के समुंद्र में धकेल सकते हैं। कल एक मीडिया रिपोर्ट पढ़ी जहाँ एक राजनितिक दल कुछ निजी सॉफ्टवेयर कंपनी के साथ मिलकर सोशल मीडिया पर अधिपत्य ज़माने में कैसे कार्यरत है ,सॉफ्टवेयर कंपनी को भी लाभ की उम्मीद है इसीलिए वह इस संधि में जुडी है ,और लाभ मिल भी रहा है। जनता का इस पर क्या असर हो रहा है ,यह किसी को नहीं पड़ी। 


एक राजनितिक विशलेषक ने एक दल को लेकर अपने विचार एक साक्षात्कार में कहे ,उनके अनुसार जब दल जान रहा है कि उसकी संवाद शक्ति में कमी है तो क्यों नहीं परिवर्तन करता है उस व्यक्ति की जो पिछले कई सालों से उस पोस्ट पर विराजमान है। वर्तमान राजनितिक चुनौतियों के सवाल पर उन्होंने इतिहास में झाँकने का इशारा किया ,और कहा उस वक़्त भी लोगों को यही लग रहा था मगर स्थिति सदैव बदलती है ,और जनता बुद्धिमान है। 


करिआकु एक यूट्यूब चैनल है ,बेहद उम्दा और प्रचलित वीडियोस हैं इस चैनल के ,करिआकु का मतलब नारियल होता है मलयालम में ,अगर समय हो तो इनके वीडियोस ज़रूर देखें। नेटफ्लिक्स और कई ब्रांड के साथ इन्होने कार्य किया है। नेटफ्लिक्स यूट्यूब पर भी अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए पॉपुलर यूट्यूब चैनल के साथ मिलकर कई वीडियोस प्रसारित करते रहता है। स्ट्रीमिंग की दुनिया में बढ़ते कम्पटीशन को देखकर शायद नेटफ्लिक्स ने अपने पैक के दाम भी कम किये थे इंडिया में। 


इंस्टाग्राम , नेटफ्लिक्स , किताब , ट्विटर , सब कुछ से ऊब जाने पर मनुष्य कहाँ जाए ,किसकी शरण में जाए। कोई सहारा नज़र नहीं आता ,तब स्वत्व की तलाश में ध्यान मुद्रा में बैठकर प्रलाप करने के सिवा कोई राह नज़र नहीं आती। एक समय स्कूल में मुझे लगता था कि जीवन से बस दो चीज़े चाहिए मुझे –जो गीत चाहे वह सुन सकूँ , जो किताब चाहे वह पढ़ सकूँ , आज दोनों चीज़े हासिल हैं। मगर वह संतोष हासिल नहीं जिसकी कल्पना मैंने कक्षा ८ में दोपहर ३ बजे अपने विद्यालय के पुस्तकालय में बैठ कर किया करता था।  


तलाश जारी है। 

अलविदा 


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