व्यक्ति विशेष का आचरण
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कल एक राजनैतिक पार्टी के नेता का जन्मदिन था ,उनके कुछ पुराने इंटरव्यू देखा यूट्यूब पर। उनके विचार तब भी सुलझे और साफ़ दिखे। कुछ दूसरे नेता उन्हें नेता मानने तक तो तैयार नहीं थे ,खैर उनका आज कोई अता पता नहीं है। चुनाव का दौर है ,और कोरोना का भी ,और दोनों में सावधानी अत्यंत आवश्यक है।
घर के आँगन में चींटियों ने हमला कर दिया है ,हर छोटे छिद्र से अपने होने का संकेत मानवों को देती रहती है ,मानव बार बार झाड़ू बुहार कर अपने विजय की घोषणा करता है ,अफ़सोस कि यह हर्ज़ अल्पविराम के बाद फिर युद्ध में तब्दील हो जाता है। सवाल यह है ,कि हमलावर कौन है ,क्या चींटियों के घर पर हमने घर बना लिया है ,या सचमुच चींटियाँ हमारे घर पर आक्रमण कर रही हैं। सच का पता लगाना थोड़ा कठिन है ,मगर असंभव नहीं। बात साफ़ हो जाने पर आगे की बात लिखी जायेगी।
पहले बहुत फ़िल्में और वेब सीरीज देखा करता था ,पहले से मेरा मतलब पिछले कुछ वर्षों से है ,मगर बीते कुछ वर्षों में ऐसा नहीं हो पा रहा है ,कोई फिल्म में आनंद ढूंढने से पहले इसकी गारंटी की चिंता सताने लगती है कि क्या सचमुच इसमें आनंद होगा ? और इसी गारंटी की चक्कर में समय नष्ट हो जाता और मन हताश। असीमित विकल्प मनुष्य के सीमित निर्धारण शक्ति पर भयंकर असर करते नज़र आ रहे हैं। टिक टोक के दौर में दो घंटे की फिल्म देखना मुश्किल साबित हो रहा है। यही कुछ हाल किताब पढ़ने का भी है। कुछ न मिल पाने का सदैव डर लगा रहता है।
कल अंकल आये ,जहाँ कार्य करते हैं वहाँ की गाड़ी लेकर आये ,आंटी और बच्चे खुश हैं। यह ख़ुशी दो दिन की है ,मगर है तो सही। फिर नया सप्ताह शुरू होगा ,और फिर सब अपने अपने दिशा को लौट जायेंगे।
कल कुछ धुप निकली थी मगर खबर छपी कि अभी ठंड बनी रहेगी और वर्षा भी। अब आगे देखने को क्या बचा है ,जब सालों पर बारिश हो और कोई मौसम का एकाधिकार हो जाए पुरे वर्ष पर।
अलविदा
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