आधार निवेश का सम्मोहन

  १  विरोध में जीवन  मृत्यु में संगम  २  आक्रोश का हल  जीवन है सफल  ३  मर्यादा की लड़ाई  मुसीबतों की परछाई  ४  प्रयासों से परिवर्तन  जीवन के मूल्य चिंतन  ५  ऊर्जा की निधि  सम्मान की परिधि  ६  शब्दों के मेल  कर्मों के जेल  ७  विचार परिवार का सम्मलेन  आधार निवेश का सम्मोहन  ८  एक सफल जीवन  छुपा हो केवल चिंतन  ९  न हो कोई अभिलाषा  जीवन की परिभाषा  दुःख में घोर आशा 

जीवंत चित्रण के स्वरचित सुर

कहानियों में छिपे सच को अफवाह मान कर एक दूसरे से लोहा लेने निकल पड़ते हैं आधी रात को ,कल कुछ ऐसा ही हुआ जब एक भ्राता श्री ने अपने फेसबुक की दुनिया में एक सनसनीखेज खबर पढ़ी ,खबर ७ वर्ष पुरानी थी और उस भ्राता श्री से केवल १ % सीधा संबंध रखती थी ,फिर भी वो इन फज़ुल बातों में कहाँ आने वाले थे ,उनको तो ज्ञान घुट्टी मिल चुकी थी ,वो बहस करने को तैयार मैदान में कूद पड़े ,और सवालों की झड़ी लगा दी ,कि आखिर जनता के कर से चलने वाले विश्वविद्यालयों में कितने उम्र तक पढाई करने की इज़ाज़त होनी चाहिए। खैर ! तनिक देर बाद उनका मस्तिष्क स्वतः धरातल पर आ पहुँचा जब कुछ अन्य तथ्यों से अवगत कराया गया। अभी माहौल शांत और गमगीन है। 


चुनावों में नेतागण कुछ भी बोलते हैं ,जब चुनाव हो तब बॉलीवुड वालों को नेताओं के पास पहुँच जाना चाहिए ,क्यूँकि इस वक़्त नेताओं के मानस पटल नयी नयी कहानियों का भंडार उत्पन्न होता प्रतिपल, बॉलीवुड प्रोडूसर्स अपनी डूबती साख बचा सकते हैं नेताओं के सहारे ,अच्छे कहानीकार बन चुके होते हैं नेता ,सपने सुहाने पिरोने में माहिर हो चुके होते हैं ,मुझे आशा है कि प्रबुद्ध जन फिल्म के इस बिंदु पर विचार करेंगे। तेलगु ,तमिल और मलयालम फिल्मों ने जिस तरह हिंदी फिल्मों को धूल चटाई है ,उसके वे स्वयं ज़िम्मेदार हैं ,बड़े पुरुष स्टार्स जो स्वयं प्रोडूसर बन फिल्म के हर दृश्य में मौजूद हो जाते हैं ,अपनी उम्र से आधी उम्र की महिलाओं को सामने रख स्वयं की उम्र छिपाने का ढोंग पकड़ में आने लगा है ,पर जनता इन सबको माफ़ करने को तैयार अगर फिल्म में कहानी मज़ेदार हो पर हिंदी फिल्मों में प्लॉट ढूँढना अमेरिका में एक नए भारतीय विद्यार्थी का अपने कॉलेज जाने के लिए सरकारी ट्रांसपोर्ट व्यवस्था ढूँढने के जैसा है। 


चलते चलते एक बिंदु पर पहुँच जाते हैं जहाँ थकन और चिंतन हावी हो जाती है सोच पर और हर कर्म पर ,आस पास सहारे की तलाश में कई दूरभाष अंकों का आगमन होता है ,पर सभी निरर्थक साबित होते हैं ,और अंत में भीड़ में भी तनहा वाले गाने सुन के मटर पनीर बनाया जाता है जन्मदिन पर। पालक की पूरी और मटर पनीर ,पनीर भी बाज़ार वाला नहीं बल्कि बासी दूध का ,तो क्या आप सही मार्ग पर हैं ? बिलकुल सही मार्ग पर क्यूँकि इस मार्ग की सच्चाई मंज़िल पर पहुँचने के बाद ही ज्ञात होती है ,रास्ते भर तो केवल अजनबियों से मुलाक़ात और वार्तालाप होती है। 


अलविदा

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