उन्माद का विस्तार
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यांत्रिक उन्नति के साथ बौद्धिक उन्नति और समाजिक चेतना भी समरूपता से बढे यह नितांत आवश्यक है पर ऐसा होता कदापि नहीं है। और ऐसी कई वजहों से कई परेशानियाँ रोज़ समाज में दिखती है, पर त्रस्त जन के पास वक़्त नहीं और उन्हें आगे और मुद्दे सुलझाने हैं। कुछ देर ठहर कर कुछ सोच सके तो यह अपेक्षित नहीं समाज से ,और लोग आने वाली पीढ़ी के ऊपर बोझ लाद कर आगे बढ़ जाते हैं।
टुसु पर्व और संक्रांति पर्व आस पास मनाये जा रहे हैं ,मूर्ति पूजन की प्रथा नहीं है आदिवासी समाज में फिर भी मूर्ति पूजन कई जगहों पर देखने को मिलता है। यह बातें आज सुबह अख़बार में पढ़ी ,एक जानकार ने बताया कि मूर्ति पूजा वाली प्रथा आस पास के प्रदेशों से चली आई है। सब मिश्रित होते समाज में एकरूपता बनाये रखना कठिन होता जा रहा है। यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका में छठ पर्व मना रहे लोगों ने अपने देश के राज्य के अख़बार में एक पत्र लिखा था पिछले साल। जिसमे उन्होंने बताया कि कैसे अमेरिका में वो पर्व मनाते हैं भले वो अपने देश से दूर हैं। दूरी बहुत कुछ करने को मजबूर कर देती है ,खासकर वह सब करने को जिससे आपका दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं होता था गाँव में। ऐसा हर जगह देखने को मिलता है।
बोराट की फिल्म देखी ,अमेरिकी समाज के छुपे भाव प्रस्तुत किये गए हैं ,ऐसे मुद्दे जिससे समाज रोज़ लड़ रहा है ,गर्भपात से लेकर ट्रम्प तक की बात की गई ,खासकर समाज में महिलाओं के स्थान और अधिकार को लेकर। एप्पल टीवी का शो “the मॉर्निंग शो “ के कुछ अंश देखे , “me too “ क्रांति के इर्द गिर्द टीवी न्यूज़ मीडिया के आस पास की कहानी है ,कैसे वह सब होता है सबके सामने जिसका पुरजोर विरोध वह लोग/कंपनी पब्लिक में करते हैं। महिलाओं का प्रतिनिधित्व पुरुष वर्षों से करते आ रहे हैं , वर्षों नहीं सदियों से , उनके बारे में बिना कुछ जाने भी सब कुछ जानने का ढोंग अब पकड़ में आने लगा है। जब तक उनकी कहानी उन्ही की जुबानी नहीं कही जायेगी ,ठोस परिवर्तन की उम्मीद बेकार है। हर क्षेत्र में उनकी हिस्सेदारी के बिना बड़े बड़े मंचों से भाषण देना केवल बनावटी खेल है जो असल मुद्दे को गुमराह करने के लिए किया जाता है।
बाकी तो मौसम ने मिज़ाज़ बदल रखा है ,सर्दी में भी बारिश ,और शिमला में बर्फ़बारी। कुछ तस्वीरें देखी इंस्टाग्राम पर बर्फ़बारी की ,आम जनजीवन यूँ ही चलता है ,लोग काट रहे हैं जीवन ,जैसे जो जहाँ है , उसे भरोसा अपने आप पर है। चुनाव में जीतने वाले महानुभावों पर नहीं।
अलविदा
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