आकृति का विनाश
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कितनी चालें चलकर भी जब विजय प्राप्त न हो तो हताशा घर कर लेती है , परन्तु स्वस्थ हृदय की पहचान का यही वक़्त होता है। पिछले दिनों बारिश ज़ोर से दिन भर चली ,अनुमान समाचार में पढ़ रखा था पर इसके लिए तैयारी कुछ नहीं की थी ,और हुआ यूँ कि कमरा काँपने लगा पर जब इंस्टा पर एक लेखिका के शिमला के घर में बर्फ़बारी की तस्वीरें देखी तब जाकर राहत महसूस हुई। अपनी असफलताओं का मुयाअना अक्सर खामोशी में करते रहते हैं ,क्या कारन हो सकते हैं और कैसे चीज़ों को बदल बदल अलग अलग रिजल्ट को इमेजिन करते रहते हैं दिमाग में , यह एक पसंदीदा टाइमपास भी है कई नौजवानों के लिए।
कल सुबह नाश्ते के लिए ब्रेड ढूँढने निकला ,चुकि मौसम ख़राब और थोड़ी किस्मत ख़राब ,तो ब्रेड नहीं मिली और कई दुकानों के चक्कर भी काट लिए सुबह सुबह ,उन दुकानों में भी जा पहुँचा जहाँ न जाने की कसमें खाई थी कभी ,लगभग एक साल तक सड़क के इस किनारे वाले दूकान से घर की चीज़े खरीदता था पर पिछले कुछ महीनों से सड़क के उस पार वाली दूकान से खरीददारी शुरू कर दी है ,अब ऐसा क्यों है ,इसका कोई ठोस उत्तर नहीं सिवाय इसके कि चीज़े लगभग दोनों दूकान में समान दर में मिलती हैं ,हाँ इस वाले दूकान में दूध और पनीर भी मिल जाता है और ब्रेड भी मिलता है मगर कभी कभी ,जब मैंने इसका कारण सड़क के उस किनारे वाले दूकान से पुछा था तब उसने बताया कि उसके परिवार में कोई पास के दूध की फैक्ट्री में कार्यरत है इसीलिए उसे इच्छानुसार दूध के पैक मिल जाते हैं वहीँ बाकियों को मुश्किल का सामना करना पड़ता है। इस कारन भी थोड़ा विश्वास हुआ मुझे क्यूंकि इसके पास कुछ मिले चाहे न मिले दूध के पैक सदैव मिल जाएंगे। मगर ब्रेड नहीं मिल सका मुझे ,तो रास्ते में निकल ही पड़ा था कि एक छोटी दूकान दिखाई दी जिसमे लोग सिगरेट और पान मसाला खरीदते दिखे ,वैसे यहाँ तो ब्रेड मिलना और मुश्किल था मगर आज मैं आशावादी का रूप धारण कर चूका था तो उसे निभाने के लिए पूरी तरह तैयार भी था।
दुकान पर पहुँचते ही मेरी आशा निराशा में बदली मगर मैंने हिम्मत नहीं हारी ,अपनी असीम आशा के सागर में गोता लगाते हुए मैंने अपने भीतर के क्राइम मास्टर गोगो के प्रचलित डायलॉग को जीवन मन्त्र बनाया –कि आया हूँ तो कुछ लेकर जाऊँगा , और मैंने दूकान में मौजूद महिला से अन्य चीज़ों की जानकारी ली ,पर प्रतीत हुआ कि वह चीज़े भी नहीं है ,तब मैंने कहा आटा तो होगा ही वही दे दो ,फिर मेरी नज़र मैग्गी पर पड़ी और उसको भी मेरे हवाले करने का आग्रह किया। आंटी ने बताया कि अक्सर दुकान पर अंकल बैठते हैं और अभी प्रातः बेला में वह स्नान ध्यान में व्यस्त हैं ,. आंटी घर का नास्ता भी बना रही थी ,दूकान भी संभाल रही थी और पड़ोस के कुछ औरतों के कुछ मुद्दों का हल भी निकाल रही थी। आटा ,मैगी और चूड़ा लेकर मैंने कीचड हो चुके रास्तों में डूबकी लगानी शुरू की।
बाद में मैंने निश्चय किया कि अब से सुबह किसी की खोज में नहीं निकलूँगा।
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