इतिहास बोध का घमंड
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कुछ नहीं मिलने पर जो कुछ है उसका भी तिरस्कार शुरू हो जाता है ,आँखों के आगे अँधेरा छा जाता है ,सब सुनसान और भयावह लगने लगता है ,मित्र दुश्मन और परिवार अजनबी नज़र आते हैं ,आशा की किरण निराशा की खाई नज़र आती है ,ऐसे लम्हों में अपने कृत्यों का अपराध बोध घेर लेता है। हर कर्म को मापने के मौके मिल जाते हैं ,हर छोटी बात और घटना नए सिरे से गढ़ी जाने लगती है ,कोई नहीं होता सच बताने को ,क्यूँकि सबसे स्वयं को दूर कर लिया होता है आपने ,फिर चिंता सताती है भविष्य की ,वह भविष्य जिसे किसी ने देखा नहीं ,वह जिसे किसी ने सुना नहीं ,वहाँ पहुँचकर भी स्वयं को दोषी करार देने लगते हैं आप ,भूत तो सर चढ़ा ही था -भविष्य भी दुश्मन बन खड़ा होता है। यह मोह जाल मानव मस्तिष्क पर अत्यंत तीव्र चोट करता है जिससे कुछ क्षणों के लिए अपने अस्तित्व का एहसास शून्य होता है और भीड़ में भी अकेले गुमसुम सबको निहारते नज़र आते हैं महानुभाव पार्क में। फिर लोग पूछते हैं कि उदासी किस बात की है ,और एक झूठी कहानी सुना दिन समाप्त हो जाता है।
मैंने सुनी हैं ऐसी लाखों कहानियाँ जिसे किसी को नहीं सुना सकता , पर उन कहानियों का सार कई शब्दों में सुना और पढ़ा है हर कहीं ,सभी जानकार भी अनजान बनने का नाटक कर रहे हो जैसे ,ठीक वैसे जैसे नए शहर में आप बस सँख्या भूल जाए और गलत स्थान पर उतर जाए। ऐसे कई अनुभवों को संजोकर आगे चलते रहने से सही स्थान का रस्ता मिल जाता है ,पर रास्ते में कोई मदद करने वाला नहीं मिलता ,या आप किसी से मदद नहीं लेना चाहते ,क्यूँकि स्वयं की राह बनाने में तनिक विश्वास अधूरा है। एक दिन ऐसा नहीं होगा ,सबकी मदद लेने को मजबूर होना होगा ,तो क्या आज नहीं मदद ले रहे सभी से ,इसका उत्तर है हाँ।
मौसम शिमला जैसे हो तो पर्यटक अपने घर नहीं जाए ,फिर ऊब जाएगा ,मनुष्य का स्वभाव है परिवर्तन ,वह शांत एक स्थान पर अधिक देर टिक नहीं सकता ,उसके भीतर कीड़े दौड़ते हैं जो चलते रहने को मजबूर करते रहते हैं ,कुछ न मिल पाने का दुःख भी अधिक देर तक नहीं टिका रहता ,आशा जुडी है हर नए कदम से ,इसीलिए बर्फीले मौसम में भी पीने का पानी जमा करने को वह बाल्टी और रस्सी लेकर निकल पड़ती है। ऐसे तो कई तस्वीरें छपती है ,पर यह तस्वीर चौंकाने वाली है , जहाँ स्रोत हैं वहीँ विद्रोह है ,वहीँ लोग आपस में तलवार लिए खड़े हैं कि पानी आज सबसे पहले मैं भरूँगीं /भरूँगा। कोई सुनने वाला नहीं जब पहाड़ों पर पानी सुख जाते हैं ,पेड़ काटकर सड़क चौड़ीकरण किया जाता है पर्यटकों के सुविधा के लिए ताकि और दोहन हो सके और यह स्थान पर भी कूड़े के ढेर और प्लास्टिक की बोतले और ढहते घर का गोलाकार मलबा इकट्ठा किया जा सके। ट्रैन नहीं चलती यहाँ ,बस केवल है सरकारी ,जिसके पास पैसे हैं वो अपने अपने निजी साधन
किराया कर फर्राटे से घुमावदार रास्तों पर दौड़ाते हैं ,सड़के सीधीं नहीं है समतल स्थानों की तरह ,यहाँ पहाड़ों को काटकर गोलाकार -घुमावदार रास्ता तैयार किया गया है जिसमे हर दो कदम पर सड़क मुड़ती है जैसे आगे बढ़ कर फिर पीछे लौट रही हो ,बहुतों को चक्कर भी आता है जैसे एक बच्चे को सातवीं कक्षा में ईटिंग सर्कल्स हुआ था ,फिर भी लोग पैसे और अपनी आत्मा लिए बर्फ की पहाड़ी पर चढ़े चलते हैं ,ऊपर पहुँचकर निचे आने की होड़ शुरू हो जाती है। जितने अधिक पैसे उतनी जल्दी सुविधा का भोग कर अपने अपने मन मुताबिक तोहफों का बंदरबाँट भी किया जाता है।
धीरे धीरे समय ख़त्म हो जाता है ,तो याद में कुछ नहीं रह पाता ,वह तस्वीरें भी नहीं पहचान में आती जो इन्ही लम्हों में साथ देने के लिए ली गई थी ,सब कुछ धुँधला धुँधला सा लगता है ,इतनी कम उम्र में कैसे यादें कमजोर हो सकती है ,अभी तो सर पर बाल भी नहीं सफ़ेद हुए ,यह करिश्मा आज के दौर का नया रोग है ,जिससे कोई अछूता नहीं रहेगा ,सभी इससे पीड़ित होंगे ,यह भविष्वाणी नहीं सत्य है जिसे मैंने अनुभव किया ,वह सभी कल अनुभव करेंगे ,समय का पहिया थोड़ा स्लो है पर चलता यह अनवरत है ,कोई रोक नहीं सका ,और इसी के आपेक्ष में आकर कइयों ने मूर्तियाँ बना डाली अपनी ताकि आने वाली पीढ़ी उनके बलिदान को याद रख सके ,पर उन्होंने आने वाले पीढ़ी से यह नहीं पूछा कि उनकी इच्छा क्या है –क्या वह अपने पूर्वजों को याद रखने का शौक रखते हैं -क्या उनके पास वक़्त है -क्या उनको याद करने की तकनीक का पता है ?
बस का नंबर नहीं याद है ,न ट्रैन का नंबर याद है , तो फिर क्या याद है , कितनी बार यात्रा की , वह भी नहीं याद , याद है तो बस केवल कुछ क्षण , वह पल जिसमे मैं चिंतित था , वह पल जिसमे मैं थका -डरा -सहमा -दुखी -बेताब -बेचैन -परेशां -खोया हुआ था।
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