विहंगम परिक्रमाओं के आचरण
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चिंतित समाज शांति हासिल करने के प्रयास में सबसे कमजोर वर्ग को निशाना बनाता है ,अत्यधिक सोच समझ की कल्पना करने वाले अक्सर शब्दों में उम्र गुज़ार आने वाली पीढ़ियों में नसीहतें बाँटते फिरते हैं ,किसी का कोई दोष नहीं अगर आपके साथ कुछ बुरा हो जाए ,मगर दोष किसी का तो है ,मगर हमारा समाज हमे किस्मत पर यकीन रखने की तालीम देता है जैसे परसाई जी कहते हैं कि हम इतने ताक़तवर हैं कि कोई बटुआ भी चोरी हो जाए तो उसका बदला उपरवाले के ज़िम्मे लगाकर आगे निकल पड़ते हैं ,बड़े किस्मत विश्वासी जन हैं हम क्यूंकि उसके अलावा कोई रास्ता भी नहीं है ,अपने माता -पिता के सीख को अपने बच्चों तक पहुँचाना ही सबसे बड़ा कर्म माना जाता है ,शादी इसका एक उचित और समाजिक पोषित माध्यम है जिसे कोरोना भी कुछ नहीं कर पाया। लोग बढ़ते रहे और आगे चले कि शायद कोई न कोई तो हल मिल ही जायेगा पर ऐसा हो नहीं पाया।
नए साल में कुछ नया करने की होड़ में वही पुरानी आदतों को नए नाम से अपने दिनचर्या में उतार कर मिठाई वितरण समारोह का आयोजन भी कर लिया गया ,मतलब ढूँढने वाले अक्सर सिनेमा भवन के सामने अर्धनग्न अवस्था में टिकट खरीदते हुए पाए जाते हैं पर कोरोना ने उन्हें नेटफ्लिक्स का सब्सक्राइबर बना दिया ,अब वो ट्विटर पर गाली देते हैं। ख़ुशी कैसे मिलती है इसकी चिंता किये बिना वह आगे बढ़ने वाली कहावत का अनुसरण बड़ी आबादी करती है रोज़ क्यूँकि बाकि भी वैसा ही कर रहे हैं ,एक बार मैंने एक सवाल का उत्तर एक फॉर्मेट में देकर सोशल मीडिया पर वेलिडेशन ढूँढने की कोशिश की थी ,कुछ देर बाद देखा कि कई अन्य लोगों ने उसी फॉर्मेट में अपने उत्तर प्रस्तुत किये थे ,तो भेड़ चाल वाली प्रथा के शिकार का कारन अंदरूनी बनावट है और थोड़ी बहुत समाजिक संरचना।
अब सब बेकार हो गया ,यह सोचते हैं हम अपने असफल प्रयासों के बारे में ,बहुत गलत सोचते हैं ,कुछ तो मिलता ही है ,जो कुछ नहीं करता उसे भी कुछ मिलता है ,अब क्या मिलता है यह तो कुछ नहीं करने के बाद पता चलेगा ,पर जो कुछ कर लेते हैं उन्हें बहुत कुछ मिलता है भले दुनिया उन्हें सफलता के सिद्धि न हासिल करने का आरोप जीवन भर लगाए।
रात के बाद सुबह और सुबह के बाद शाम ,और फिर रात ,यह चलता रहता है ,पर यहाँ किसे समझा रहा हूँ मै , यह पता करने में थोड़ा वक़्त लगेगा ,इसीलिए रुकावट के लिए खेद है।
धन्यवाद।
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