उलझता माहौल
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पहले ऐंठ थी अब शर्म है , यह डायलॉग के साथ फिल्म की शुरुआत होती है ,बीहड़ में बागी होते हैं ,और बागी के धरम निभाने पड़ते हैं ऐसे कई डायलॉग हैं ,सोनचिरैया बहुत दिनों से देखने की सोच रहा था ,कल देख ही लिया। कहानी कई दिशाओं में घूमती हैं ,और कुछ देर बाद एक बच्ची के जीवन पर आकर अटक जाती है ,जिसे सभी ढूँढ रहे हैं ,डॉक्टर उसका ईलाज करने से मना कर देता है क्यूँकि उसकी जाति अलग है ,पुलिस दरोगा भी मारा जाता है क्यूँकि उसकी जाति अलग है। सब जातियों में सबसे निचे है औरत जाति –ऐसा एक महिला डकैत कहती है दूसरे महिला से जब वह कहती है कि वह उसकी गैंग में नहीं शामिल हो सकती क्यूँकि वह ठाकुर है ,यह महिला डकैत का किरदार जो शायद फूलन देवी से प्रेरित चरित्र लगता है फिल्म में और नाम होता है फ़ुलिआ।
मनोज बाजपाई का किरदार बहुत छोटे समय के लिए परदे पर नज़र आता है मगर फिर भी प्रचार प्रसार यूँ किया गया कि वह मुख्य किरदार है , जाति और जेंडर को लेकर कई दृश्य और डायलॉग मिल जायेंगे इस फिल्म में।
कोई क्या करे जब दूसरा आहत महसूस करे ,और सीधे तौर पर न कह कर कुछ और बातें कहे ,इशारा काफी होता है समझदार के लिए ,कल ऐसा ही हुआ मेरे साथ ,मगर उस मित्र को कुछ कह नहीं पाया ,सोचा बाद में अपनी भूल के लिए क्षमा माँग लूँगा ,मगर वह भी संभव नहीं हो सका। यह सब समझ हमारी बातें ख़त्म होने के बाद आई ,जब मैंने सोचा उसके अजीब व्यव्हार के बारे में ,तब यही अंदेशा लगाया कि शायद उसे मेरी बातों का बुरा लगा हो।
पालक ,बैंगन और आलू की सब्ज़ी कल बनाई ,थोड़ा तीखा अधिक हो गया ,लहसून और अदरक और मिर्च की मात्रा अधिक हो गई थी। गाजर का हलवा भी बनाया इस तीखेपन को शांत करने के लिए ,तब जाकर हिसाब बराबर हो सका। सर्दियों में हरी सब्ज़ियाँ प्रचुर मात्रा में मिल जाती हैं ,और सब के सब परांठे के लायक हैं ,अफ़सोस कि वही बनाना नहीं आता।
अलविदा। प्रयास जारी है।
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