पश्चिमी विक्षोभ का असर
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कहीं न कहीं किसी का असर होता है ,जैसे मौसम वैज्ञानिक रोज़ाना अनुमान करते हैं और लाखों लोग की जान माल की रक्षा होती है ,फिर लोग उन पर आश्रित होते हैं ,और गति से गति बनती जाती है। एक दिन यूँ ही जब चर्चा चली तो बात यहाँ तक पहुँची की अच्छा रास्ता क्या है ,कौन निर्णय करे कि कैसा होगा अंत ? हरी सब्ज़ी सस्ती चाहिए , ५ रूपए भी अधिक नहीं दे सकते हैं लोग ,कौन हैं ये लोग ,ये लोग वही हैं जो वक़्त बेवक़्त वैश्विक मुद्दों पर ग़हरी चिंता ज़ाहिर करते हैं ,और फिर धुँए में खो जाते हैं।
सही निर्देशन क्या है ? इसका अनुमान लगाना एक आलोचक के लिए कितना महत्वपूर्ण है ,यह अनुमान लगाना कतई महत्वपूर्ण नहीं है एक पाठक के लिए ,वह तो फिल्म का आनंद लेकर पैसा वसूल करने में व्यस्त है ,अगर उसे यह महसूस हुआ कि उसका समय बर्बाद हुआ तो उसे पैसे बर्बादी की भी चिंता सतायेगी , और फिर कोल्ड ड्रिंक्स और समोसे के खर्चे में कटौती होगी। अब फिल्म इमरान हाशमी की हो या फिर दिलीप कुमार की ,लोगो को उनका मज़ा चाहिए बस ३ घंटे के लिए ,आज नगद और कल उधार वाली रणनीति नहीं चलती है यहाँ ,दोबारा मौका देना बेहद कठिन लोगों के लिए। अगर देखा जाए तो फिल्म का ट्रेलर एक प्रोटोटाइप है और फिल्म के रिव्यु एक प्रकार के फर्स्ट यूजर के टिपण्णी हैं ,और इन्ही कुछ बिंदुओं को ध्यान में रखकर दर्शक एक नयी फिल्म को देखने का फैसला करता है। सऊदी अरब ने पिछले साल अपने यहाँ आयोजित फिल्म महोत्स्व कोरोना के चलते कैंसिल कर दी थी ,जो इस साल आयोजित हुई। फिल्म महोत्स्व का आयोजन क्यों होता है ? राजनीतिक और कला अगर एक साथ हो तो क्या होता है इसका सफल और असफल उदहारण इतिहास में कई बार दर्ज़ किया जा चूका है ,राजनैतिक ताक़तें अपने हितों को साधने के लिए कला महारथियों के सहारा लेकर आम जन के बीच अपनी पैठ बनाने की कोशिश निरंतर करते रहती हैं। अमेरिकी फिल्म एक राजनैतिक हथकंडा है ,यह सच है या नहीं ,पता नहीं , पर अमेरिकी फिल्मों का बहुत बड़ा सांस्कृतिक असर विश्व के कई देशों के लोगों पर पड़ता है। धर्म भी अगर साथ जुड़ जाए तब तो सोने पर सुहागा वाली कहावत सिद्ध हो जायेगी ,वैसे धर्म से कोई प्रत्यक्ष लाभ/हानि का रिश्ता साधे बिना कई फिल्मे इनके प्रचार में ज़रूर लगी रहती हैं।
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