त्रासदी की कल्पना
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त्रासदी की कल्पना
जीवित होकर भी मरणासन्न जीना सबके बस की बात नहीं। अथक प्रयास से सफलता मिलती वाली कहानी कई बार भाषणों में सुनी और लेखों में लिखी ,इसका वास्तविक अनुभव बेहद अलग है ,जैसा कि अक्सर शब्दों और कर्मों का अंतर होता है।
कल शाम सब्जी वाले से एक युवक यह बात कह हँस रहा था कि अगर कोई लड़की होती तो दाम कम लगता सब्जी का ,सब्जी वाले ने उसकी बात को नकारते हुए हँसी में हँसी मिलाई। युवक का कहना कि उसके पिता से सब्जी वाला जो भाव लगाता है वह उससे नहीं लगा रहा है और युवक से अधिक मूल्य लिया जा रहा है। इसी बात को आगे ले जाते हुए उसने यह लड़की वाली बात कही। कल कर्नाटक के एक नेता का बयान और बाकी नेताओं की हँसी गूँजी सदन में ,उनके बयान पर कड़ा प्रतिरोध जताते हुए एक नेत्री ने सदन के स्पीकर पर भी करवाई की बात की ,पर शायद यहाँ उन्हें यह नहीं ज्ञात रहा की सदन के स्पीकर उन्ही के पार्टी के है ,या ज्ञात होते हुए भी उन्होंने महिलाओं के सम्मान को सर्वोपरि समझकर करवाई की बात की हो। असल में क्या सोच थी उनकी यह किसी ने नहीं जानने की कोशिश की ,पर होना तो यही चाहिए था कि महिलाओं के सम्मान की बात सर्वोपरि होनी चहिये। पर तब तक उनकी पार्टी के दो नेता (पुरुष) ने नेत्री के बयान को एक अलग एंगल देते हुए अपनी पार्टी के स्पीकर को बचाते हुए यह कहने लगे कि स्पीकर महोदय केवल हँस रहे थे और उन्होंने कोई बयान नहीं दिया था ,इसीलिए उन पर करवाई की बात जायज़ नहीं है।
हँस रहे थे ? हँसना का क्या मतलब होता है जब ऐसे शर्मनाक और घृणित बातें कही जा रही हैं सदन में ,वह सदन जहाँ नियम कानून और चर्चा का स्थल है। हँसने का केवल मतलब यहाँ समर्थन ही नहीं बल्कि बहुत कुछ है–वह उस कलुषित सोच का समर्थन है जो समाज में व्याप्त है-वह उस घृणित कृत्य का समर्थन है ,और दूसरा है चुप्पी –जैसे कि सदन के बाकि सदस्यों ने अपनी चुप्पी से उस वक़्त प्रदर्शित किया। चुपचाप वाला समर्थन किसको लाभ पहुँचाता है यह सभी भली भाँति जानते हैं।
तो यह है स्तर नेताओं का, और समाजिक सोच का महिलाओं के प्रति और रेप के प्रति , उन्हें यह हँसने और ठहाके लगाने का विषय नज़र आता है जहाँ जो मन चाहा टिपण्णी कर दे और मंत्री -नेता बनाकर जनता का प्रतिनिधित्व करता रहे –वही जनता जो इसको रोज़ झेलती है।
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