संकुचित संतुलन
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संकुचित संतुलन
जीवनयापन के कई उपायों में जो सबसे पुराना है ,वह यहाँ अभी तक प्रचलित है ,रूप में तनिक परिवर्तन है। मनुष्य कई पड़ावों को लाँघ आज यहाँ पहुँचा कि यह पृथ्वी अब रहने लायक नहीं रही ,इसको ध्वस्त कर ही चुके वाले मोड में अब दूसरे ग्रहों के खोज तीव्र हो चली है पिछले दशकों में ,कोई मंगल तो कोई चन्द्रमा पर गलियारा खड़े करने की सोच रहा है। और यहाँ सभी देशों से मिलकर वर्ष दर वर्ष केवल क्लाइमेट सम्मेलन होते हैं और जब पैसे देने की बारी आती है निपटने के लिए तो भविष्य में टालकर अपने अपने देश निकल पड़ते हैं। बड़ी बड़ी हैडलाइन छपती है ,और लोग अपने हाल पर रह जाते हैं।
साग सब्जियों की खरीददारी हुई कल ,साप्ताहिक बाज़ार में शामिल होना एक अलग अनुभव है ,सब्जियों की एक तस्वीर व्हाट्सप्प के गलियारे में भी पहुँची ,तब इस बात का ख्याल आया कि आखिर क्या है इन सब्जियों में जो इतना आकर्षित करता हैं मानवजन को ? उत्तर मिला— प्रकृति का रूप। वह रूप जो विलुप्त होने के कगार पर है मानव के कृत्यों से।
एक पॉडकास्ट कल सुन रहा था ,एक mit वैज्ञानिक /बायोलॉजिस्ट कुछ दूसरे वैज्ञानिकों के बारे में बता रहे थे कि महामारी से बचाव के लिए ,इन वैज्ञानिकों ने वैसे सभी वायरस को खोजने का फैसला कर लिया है जिससे महामारी फ़ैल सकती है – फिर वो वायरस अन्य जीव -जंतुओं में हो सकते हैं जिनसे निकलकर वो मनुष्य में प्रवेश करें ,या फिर वो लैब में भी विकसित किये जा सकते हैं। उस वैज्ञानिक का कहना था कि यह बेहद खतरनाक प्रयोग है भले ही इसका मिशन मानव रक्षा क्यूँ नहीं हो ,क्यूँकि लैब से वायरस लीक होने की संभावना है और दूसरा अगर ऐसे वायरस को बनाने /या उसके बारे में जानकारी किसी गलत हाथों में लग गई तो मानव रक्षा के बदले मानव विनाश संभव है। उन्होंने नुक्लेअर टेक्नोलॉजी का उदहारण देते हुए अपनी बात रखी कि क्यूँ नुक्लेअर को लेकर इतनी सीक्रेसी और डर इसीलिए लोगों के बीच बना रहता है कि इसके बहुत बुरे परिणाम हो सकते हैं।
मगर वह वैज्ञानिक उन दूसरे वैज्ञानिकों को समझाने में असमर्थ महसूस कर रहे हैं ,क्यूँकि उन लोगों ने इस प्रयोग के खिलाफ बोलने वाले को विज्ञान के ही खिलाफ बता दिया है ,और कहा है कि ऐसे तो विज्ञान में नवाचार समाप्त हो जायेगा ,और मानव जन कुछ नया निर्माण नहीं कर पायेगा भविष्य में।
स्कूल के इतिहास किताब में बस यही पढ़ा कि मीर क़ासिम को अंग्रेज़ों ने बंगाल का राजा बनाया ,जैसा कि उसके ससुर मीर जाफ़र को बनाया था जब वह सिराजुदौला का सेनापति होते हुए अंग्रेज़ों के साथ हो गया था और स्वयं राजा बनना चाहता था ,और अंग्रेज़ों को इसके बदले करोड़ों रूपए टैक्स के रूप में और गिफ्ट के रूप में देने को तैयार हो गया। मीर क़ासिम बंगाल ,बिहार छोड़ अवध पहुँचा ,ताकि अंतिम बार अंग्रेज़ों से टक्कर ले सके अवध के राजा के साथ मिल कर। इनकी सेना १५०००० के करीब थी मगर बहुत कम को लड़ना आता था ,या कभी युद्ध में भाग लिया था ,और चुकी कई गुट थे अलग अलग तो सामंजस्य नहीं था आपस में ,और अंग्रेज़ों से तो बाद में लड़ते ,ये आपस में ही रास्ते भर लड़ते-मरते चले। जगत सेठ ने मीर क़ासिम से लेकर मीर जाफर और अलीवर्दी खान से लेकर सिराजुदौला तक का राज़ देखा और अंग्रेज़ों के साथ मिलकर तख्ता पलट करने में कई बार केवल निजी लाभ देखा। अंग्रेज़ों का लड़ने का सिद्धांत यह था कि वह अँधेरे में छुप रात्रि में या एकदम सवेरे गुर्रिले वारफेयर करते थे चुकि उनकी सँख्या कम थी। ये सभी किस्से विलियम डालरिम्पल की किताब “the अनार्की “ के पढ़ने के दौरान पता चल रही हैं।
इतना सीधा साधा तो कुछ नहीं होता ,खासकर युद्ध ,और उससे भी खासकर शांति। आजकल तो न शांति है न पूर्ण युद्ध ,बीच में झूल रहे हैं कई क्षेत्र।
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