आधार निवेश का सम्मोहन

  १  विरोध में जीवन  मृत्यु में संगम  २  आक्रोश का हल  जीवन है सफल  ३  मर्यादा की लड़ाई  मुसीबतों की परछाई  ४  प्रयासों से परिवर्तन  जीवन के मूल्य चिंतन  ५  ऊर्जा की निधि  सम्मान की परिधि  ६  शब्दों के मेल  कर्मों के जेल  ७  विचार परिवार का सम्मलेन  आधार निवेश का सम्मोहन  ८  एक सफल जीवन  छुपा हो केवल चिंतन  ९  न हो कोई अभिलाषा  जीवन की परिभाषा  दुःख में घोर आशा 

टूटा हुआ कप

 टूटा हुआ कप 


सुबह रास्ते में घाँस पर एक सफ़ेद आकृति दिखाई दी ,थोड़ी गन्दी ,थोड़ी पुरानी ,पर अपने रूप में तटस्थ ,पास जाने पर बनावट और साफ़ हुई और मष्तिस्क ने आकृति के साथ एक नाम जोड़ दिया। यह नामकरण का सिलसिला बहुत पुराना है ,जो जानवर हम पालते हैं उसका भी नामकरण कर देते हैं ,क्यूँकि उस पर अपने अधिकार सिद्ध करने में आसानी होती है ,वैसा ही कुछ दूसरी प्रजातियों के साथ है ,या कोई भी अन्य वस्तु के साथ है। एक औपचारिक संबंध स्थापित कर अपने मनस्थिति को शांति प्रदान करने का निरर्थक प्रयास जीवन पर जारी रहता है। 


किसी भी घटना /वस्तु के आगे “द ग्रेट इंडियन “ जोड़ देने से उसमे क्या बदलाव होता है ,यह कल रात एक वेब सीरीज देखते हुआ ज्ञात हुआ ,प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक और अभिनेता की जोड़ी ने एक चर्चित किताब को एडाप्ट किया है ,कई तीर एक साथ चल चुके हैं कहानी में मगर केंद्र पर एक परिवार है जो राजनीति और सिनेमा के आस पास घूमता है, अभिनय संजीदा है कुछ कलाकारों मगर संवाद बेहद निम्न दर्ज़े के हैं , महिलाओं के प्रति जिस तरह की भाषा और कृत्य दर्शाया गया है वह सोचने पर मजबूर करता है कि उनका दर्शाना कितना सार्थक है कहानी के लिए ,और क्या कोई और तरीका नहीं है उसी बात को कहने का ,महिलाओं पर अत्याचार और दुर्व्यवहार कर ही क्यूँ किसी दृश्य और चरित्र को एक ख़ास नज़र में ढाला जाए ,बातों को कहने के या यूँ कहे दृश्य के मर्म को दर्शकों पर पहुँचाने में निर्देशक कई तरीकों का उपयोग कर सकता है जिससे दृश्य कितना महत्वपूर्ण है कहानी के लिए या फिर कहानी के चरित्रों के लिए ,इस बात का पता चल सकता है। अभी दो एपिसोड ही देखे हैं ,आगे कितना देख पाउँगा यह कहना मुश्किल है।  

 

कल एक मित्र ने अपने किचन में वर्षों के किये गए मेहनत का बखान किया ,अच्छी बात है जब मिलकर गृहस्थी में पुरुष अपनी भागीदारी निभाए। चीज़े बदल रही है ,इसका पाता आप अपने आस पास से ही लगा सकते हैं ,पर यह भी ध्यान रहे कि इसे सार्वजानिक और सामाजिक सच मानकर नहीं बैठ जाना चाहिए ,जितनी तेज़ी आपके आसा पास हो रही है ज़रूरी नहीं कि सभी जगह वैसे ही हो या वैसे हालत हो बदलाव के। 



आज धुप निकली है ,चुनाव में एक पार्टी के नेता को केवल जाति के प्रतिनिधि से जोड़कर देखा और बोलै जाता है मीडिया में ,तो क्या जाति की राजनीति केवल वही नेता करती हैं ,बाकि मुद्दों पर वोट पा लेते हैं ,उनको लेकर मीडिया में असंख्य झूठ सालों से चलाये जा रहे हैं ,और आज भी चुनाव में वैसे ही हो रहा है ,उनके नाम को केवल एक जाति तक सीमित करने का निरंतर प्रयास किया जाता है मीडिया में। तो पता करे मीडिया में उच्च पदों पर आसीन कौन से जाति धर्म से ताल्लुक रखते हैं और बातें साफ़ हो जायेंगी। 


अलविदा 


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