अनिश्चितिताओं के दन्त मंजन
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कितनी बार कोशिश की ,कि चलती राह में सब के साथ सवार होकर आगे बढ़ चलूँ , मगर ऐसा हो न सका, “आंतरिक इच्छाशक्ति कमजोर मालुम पड़ती है “ ऐसा कई लोगों ने कहा ,मगर क्या ऐसी बात है ? यह कौन बता सकता है। बहुत सहेजकर किये गए कार्य का फल क्षणिक साबित हो तो दुःख होता है ,मगर दुनिया दुखों का सागर है , गहराइयाँ फिल्म से काफी दर्शक नाराज़ हैं कि उनके साथ धोखा हुआ है ,अब वह फिल्म निर्देशक के अगले फिल्म के इंतज़ार में हैं ताकि उसे नहीं देख सकने की टिपण्णी मित्रों के बीच करे।
उसने कहा पैसे ऊपर लेकर नहीं जाओगे ,मैंने कहा सत्य वचन है मगर अभी बहुत कार्य है ,फिर मै आगे बढ़ चला। बुद्ध की मूर्ति कई घरों में शोभा की वस्तु के रूप में परिवर्तित हो चुकी हैं ,ऐसा ही कई हिन्दू देवी देवताओं के मूर्ति के साथ भी हुआ है ,मूर्ति नहीं तो पोस्टर नहीं तो टैटू इत्यादि। उस धर्म के उपासक अक्सर नहीं होता जो ऐसा करते हैं ,याद आता है कि अमेरिकी गायक माएली सायरस ने दीपावली की पूजा करवाई थी अपने घर और कुछ तस्वीरें इंस्टाग्राम पर साझा की थी , बुद्ध की मूर्तियाँ को अक्सर सजवाट के दुकानों में देखने को मिलता हैं न कि पूजा पुष्प के दुकानों में। क्या ऐसा भौतिकता के कारन हो रहा है ? क्या केवल ऐसा अमेरिकी और यूरोपियन देशों में हो रहा है ?
कल अचानक बाज़ार में बुद्ध की मूर्ति पर नज़र पड़ी ,यह ख्याल आया कि बौद्ध धर्म के उपासक के लिए क्या बुद्ध की मूर्ति सजवाट की वस्तु है ? नहीं। धार्मिक मूर्ति, पुस्तक ,सिंबल के साथ यही व्यवहार हो तो आपको कैसा अनुभव होगा , जो धार्मिक नहीं भी हैं वह भी विश्वास करते हैं कि जो धार्मिक हैं या आस्था रखते हैं उनके भावनाओं का सम्मान हो समाज में।
दुविधा में होना दुखद अनुभव है ,पर सुखद काल है भविष्य के नज़रिये से ,यह काल सबकुछ बदल देने की हिम्मत साथ रखता है ,अब वह हिम्मत कितनी देर रहती है यह तो देखने की बात है पर जितनी भी देर हो मनुष्य हवाई सैर करता नज़र आता है ,एक शहर से दूसरे शहर भागा भागा फिरता है और शाम को खाली हाथ घर लौट कर कल के चिंतन में कल करता हुआ सो जाता है।
चरैवती चरैवती
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