मित्रों की मंडली
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जितने शिकार उतने विकार ,एक प्रार्थना में शामिल हो शांति कायम करने के प्रयत्न में असफलता हासिल करने का उदेश्य है। इधर एक स्थान पर टिके रहने का नुक्सान यह है कि उसकी आदत लग जाती है , फिर सफर तय करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है , पड़ाव को मंजिल मान लेने की भूल कई दफा की है ,अब मगर यूँ लगे कि सब देख लिया और कुछ देखने की इच्छा नहीं रही ,ऐसा पल आना भी बुरे वक़्त का संकेत है। भविष्य के प्रति उदासीनता मानव जगत के लिए बेहतरी का सबूत नहीं है ,सकारात्मक विचार के सहारे ही झूठ को सच मान लेने वाले नेता आजकल जबरजस्त रैलियाँ करते नज़र आ रहे हैं और वही वादे दुहरा रहे जिनको पिछले पाँच सालों में पूरा नहीं कर पाए। पार्टियां एक दूसरे के वादों -इरादों के नक़ल करते थकती नहीं और जनता अपनी किस्मत को लेकर अदृश्य शक्तियों के शरण में जा पहुंची हैं।
नशाखोरी(अलकोहल,हेरोइन आदि ) बेहद गंभीर समस्या है , एडिक्शन एक बीमारी है जिसका इलाज़ बाकी बिमारियों की तरह किया जाना चाहिए ,कल के एक वीडियो में एक बूढ़े पिता के दर्द सुनकर यह एहसास हुआ ,उसने अपना पूरा परिवार खोया ,अपने व्यवसाय खोया ,और आज अपने बच्चे को बचाने के लिए अस्पताल के चक्कर काट रहा। एक दंपति ने अपना दर्द बयां किया जिसमे पुरुष को अलकोहल की एडिक्शन है ,डॉक्टर कई बार मना करता है ,पारिवारिक क्लेश और तनाव बढ़ते जाते हैं ,ईलाज जारी है।
फ़िराक गोरखपुरी को करीब ९ हज़ार वोट मिले थे , चुनाव हार गए फिर नहीं लड़ा , प्रेमचंद ने हथकरघा का कार्य भी किया कुछ महीनों तक ,कल यह सब बातें एक जानकार यूट्यूब पर बता रहे थे ,चुनावी माहौल में इतिहास एक शहर का कितना महत्वपूर्ण है ,चुनावी मुद्दे कौन तय करता है ,जब मंत्री अपनी सीट ही हार जाए तो बाकियों का क्या कहना ,पैसे और जाति का रौब कब तक चल सकता है ,अब तक तो चलता नज़र आ रहा है चुनाव में ,आगे क्या हो क्या पता ?
एक प्रार्थना उक्रैन के आमजन के लिए ,और पश्चिमी मीडिया के रिपोर्टिंग के रवैये को मापने का भी समय है यह ,जब मिडिल ईस्ट या अफ्रीका के देशों में हमले या लड़ाइयाँ होती तब यही मीडिया कैसे कवर करता है इनको और जब यूरोपियन देशों में लड़ाईयाँ होती है तब कैसे आलेख लिखता है और इंटरनेट पर क्या ट्रेंड होता है।
अलविदा
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