आधार निवेश का सम्मोहन

  १  विरोध में जीवन  मृत्यु में संगम  २  आक्रोश का हल  जीवन है सफल  ३  मर्यादा की लड़ाई  मुसीबतों की परछाई  ४  प्रयासों से परिवर्तन  जीवन के मूल्य चिंतन  ५  ऊर्जा की निधि  सम्मान की परिधि  ६  शब्दों के मेल  कर्मों के जेल  ७  विचार परिवार का सम्मलेन  आधार निवेश का सम्मोहन  ८  एक सफल जीवन  छुपा हो केवल चिंतन  ९  न हो कोई अभिलाषा  जीवन की परिभाषा  दुःख में घोर आशा 

दिव्य शक्तियों का चमत्कारी उपयोग

छोटी छोटी बातें बड़े बड़े लोगों को तकलीफ पहुँचाती हैं , आखिरकार बैंक के अंतिम दर्शन के बाद देवी दर्शन करने की इच्छा हुई , मगर मौसम ने सहायक का किरदार निभाने से इंकार कर दिया। कई व्यक्तियों को अजीबोंगरीब आशंकाएँ घेरे रहती हैं ढलती उम्र तक ,वह कोई ख़ुशी, खासकर दूसरों की, मानने से इंकार कर देते हैं. सुबह पढ़ा कि एक व्यक्ति को उसके सोसाइटी वाले यह बात कह कर प्रताड़ित कर रहे हैं कि चुकि वह किरायदार हैं इसीलिए उसे कोई हक़ नहीं कि वह अपने ऊपर हो रहे यातनाओं का मुक्त स्वरों में विरोध कर सके , इस व्यक्ति के ८ वर्षीय बच्चे को लेकर मामला शुरू हुआ था। अंत में वही हुआ जिसकी सबक उम्मीद थी , रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन का मतलब है आवासीय लोगों का समूह ,वैसे वैसे मुद्दों से यह समूह आमजनों के निशाने पर रहता है ,इनके नियम और विचार कुछ अलग और ऐसे होते हैं जो कई बार तय नियमों के खिलाफ हो जाते हैं। राजनीति में दक्षता का प्रदर्शन यहाँ प्रतिपल आभासित होता है जैसा कि कई या यूँ कहें हर जगह जहाँ मनुष्यों का समूह होता है वहाँ राजनीति शुरू हो जाती है। 


मिलते मिलते लोग मिल नहीं पाते , कभी बीमारी तो कभी बहाना ,समय यूँ ही बहते बहते ऐसे मक़ाम पर पहुँचता है कि लोग पीछे मुड़कर स्वयं की तस्वीर आधार कार्ड में भी पहचानने से मुक़र जाते हैं। फिर आता है दौर मुख्तारी का , लोग भाषण प्रवचन के बाद स्वयं की इज़्ज़त मापने के सबसे बड़े आयाम का सहारा लेते हुए कुछ रुपयों के लेन देन से विधान सभा चुनाव का टिकट हथियाकर बाज़ार में वोट माँगने उतर जाते हैं ,और पूछने पर कहते हैं कि हम तो गंदगी साफ़ करने आये हैं। 


आठवीं कक्षा तक चित्रकला की क्लास में सदैव चमत्कार की उम्मीद से प्रवेश करता था , पिछले क्लास का टास्क तो पूरा न होने का डर ,और पूरा हो जाने पर उसको समझाने का डर , मेरे मित्र सुमित चित्रकला में पिकासो से कम नहीं था ,और आज भी है , उसके हाथों में जादू था , इसका कोई सिलेबस नहीं जिसे पढ़कर कोई चित्रकला पास हो जाए , इमेजिनेशन की शक्ति का इस्तेमाल करना पड़ता था ,और वह मेरे भीतर नहीं बल्कि सुमित के अंदर है। सुमित मेरे बगल में ही बैठता था क्यूँकि रोल नंबर के हिसाब से वह मेरे पहले था , और उसकी ड्राइंग नोटबुक से देखकर बाकी विषयों की तरह छापा भी नहीं जा सकता था। दो घंटे चित्रकला की क्लास के दिन सुबह से ही बहुत चिंता और डर का माहौल रहता था मेरे मस्तिष्क पर। सुमित का जैसा नाम वैसे कार्य , बहुत शांत और मिलनसार व्यक्ति है , जिसमे क्रिएटिविटी और इमेजिनेशन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं।  


अलविदा। 


Popular posts from this blog

कोरे कागज़ का सफर

किस्मतों के बुलबुले शर्म में सड़ गए

प्रलापी बूँदों के प्रवासक