आधार निवेश का सम्मोहन

  १  विरोध में जीवन  मृत्यु में संगम  २  आक्रोश का हल  जीवन है सफल  ३  मर्यादा की लड़ाई  मुसीबतों की परछाई  ४  प्रयासों से परिवर्तन  जीवन के मूल्य चिंतन  ५  ऊर्जा की निधि  सम्मान की परिधि  ६  शब्दों के मेल  कर्मों के जेल  ७  विचार परिवार का सम्मलेन  आधार निवेश का सम्मोहन  ८  एक सफल जीवन  छुपा हो केवल चिंतन  ९  न हो कोई अभिलाषा  जीवन की परिभाषा  दुःख में घोर आशा 

मुद्रास्फीति के मौखिक मंत्र

बजट आया और चला गया ,अब लोग अख़बार और यूट्यूब पर अपने लिए फायदे ढूँढ़ते फिर रहे हैं ,हर साल बजट का दिन परिवार में त्यौहार के मेले के लिए बच्चों को पैसे देने वाली दिन की याद दिलाने लगता है ,लोगों को भले मिले कुछ नहीं पर उत्साह और चिंता दोनों बनी रहती है जब तक कि यह साफ़ न हो जाए कुछ बदला नहीं है या टैक्स रेट बढ़ा नहीं है ,लोग दूसरे लोग से पूछते रहते हैं ,कर उगाही का चिंता सरकार जताती है वही लोग कर प्रतिशत को लेकर सलाहकारों को ट्विटर पर टैग करते फिरते हैं ,क्रिप्टो वाले तो खासा बेचैन हैं पर कई एक्सचेंज प्लेटफॉर्म्स ने यह घोषणा की है उनके रजिस्ट्रेशन में उछाल देखने को मिला है क्यूँकि यह खबर लोगो को लग गई है कि क्रिप्टो कानूनी हो चुका है , अब यह कितना सही है यह तो अगले बजट तक पता चल ही जाएगा ,तब तक तो जिस वर्ग को जो समझ आये वह अपने फ़ायदेनुसार दूसरे वर्ग को राय देते रहे। 


मौसम का मिज़ाज़ समझना बेहद मुश्किल है ,आज अचानक हवा ठंडी हो गई ,कल तक कुछ गर्मी का एहसास होने लगा था ,आज अचानक लग रहा है कि ठण्ड जाते जाते अपनी पहचान बता रही है हमको ,वैसे भूलने वाले तो भूल ही जाते हैं मौसम को ,आने वाले मौसम की राह देखते हैं और उसकी तैयारी में जुट जाते हैं। वर्तमान में जो है ,उसको अस्वीकार करने की प्रथा पुरानी हैं ,इसीलिए भविष्य का सपना नेता भी दिखाते रहते हैं ,जो सपने पुरे नहीं होते तो फिर नया सपना नए काल के लिए गढ़ते चले जाते हैं ताकि लोग वर्तमन में वह सवाल न पूछे जिसे पूरा करने का वादा पाँच वर्ष पहले किया था ,सब सोची समझी नीति के तहत तय होता है ,फिर अखबारों और टीवी में हज़ारों करोड़ों का विज्ञापन देकर आम जन को भरमाने का पूर्ण प्रयास किया जाता है। 


खाली समय में किताबे पढ़ने की बाते सोचा करता था जब स्कूल में होम वर्क अधिक हुआ करता था ,वह किताबे जो स्कूल के सिलेबस में नहीं है ,मुझे लगता था कि असली ज्ञान वही छुपा है ,वैसे आज भी कुछ कुछ ऐसा ही लगता है ,पर अफ़सोस कि सभी किताबे हैं ,सच कहे तो सभी किताबे हैं ,इतनी हैं कि विकल्पों के सागर में डूबते रहते हैं और कुछ नही पढ़ पाते हैं। केवल स्किम कर छोड़ देते हैं ,अब स्किम करना क्या होता है ? तेज़ गति से किताब के पन्नो को पलटना अंदाज़तन क्यूँकि आपको अपने पढ़ने की कला पर पूर्ण भरोसा होता है कि यह पन्ने में कितना असल में पढ़ने लायक है। कल ऐसे ही एक किताब पूरी की , उसमे पैसे निवेश को लेकर कई बातों का ज़िक्र था ,जब धनराशि न हो तो तभी निवेश के तकनीक जाने वरना परेशानी हो सकती है। उस किताब में लिखा था कि जीरो रिस्क जैसा कुछ नहीं होता निवेश के संसार में ,हर स्कीम में रिस्क है इसीलिए सोच समझकर निवेश करने में ही भलाई है।  अब सोचिये इसमें नया क्या है ? कुछ नहीं। पर ?


अलविदा। 

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