तिकड़म का तरीका
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बैंक की अपनी चाल होती है ,गर सरकारी है तो अलग और निजी है तो कुछ और ,इन्हीं चालों के जालों से बचने के लिए लोग बैंक अधिकारी से निजी संबंध स्थापित कर लाखों करोड़ों के घोटाले करते है राजीनीतिक दलों के साथ मिलकर। समय का आभास समय से ही मापकर किया जा सकता है ,पिछली बार अगर ट्रैन ने ५ घंटे में सफर तय किया था तो फिर इस बार का तीन घंटा बेहद उम्दा और तीव्र गति लगेगी ही भले ही असलियत में सफर केवल एक घंटे का हो. योजनाओं के मूल्यांकन के लिए स्थापित संस्थाएँ ध्वस्त हो चुकी है ,क्या वह स्वतः ही क्षीण होती हैं ? बिलकुल , गर उसमे कार्यरत लोगों से कुछ उम्मीद न की जाए या उन्हें कुछ कार्य ही न करने दिया जाए।
कल एक कार्य के सिलसिले बैंक जाने का अनुभव प्राप्त हुआ ,पिछले बार यह अनुभव पिछले साल प्राप्त हुआ था ,कोई सालाना दौरा नहीं है ,बस ज़रूरतों के शिकार हैं हम भारतवासी। तो पहुँचते ही पता चला कि अभी गुड मॉर्निंग फेंका जा रहा एक दूसरे के बीच ,मतलब अब ही बैंक खुला ही है ,मैंने सोचा कार्य महत्वपूर्ण है और कार्यरत लोग सुबह सुबह आशावादी ख्याल से लबरेज होंगे तो शायद मेरा कार्य इसी वर्ष निपट जाए और मुझे अगले वैलेंटाइन की प्रतीक्षा न करनी पड़े। दिन तो वैलेंटाइन का था ,एक स्टाफ ने बैंक के मुख्य द्वार से वैलेंटाइन डे पर छुट्टी होने की आशंका पर तीखे तंज करते हुए प्रवेश हुए ,अब यह टिपण्णी क्यों की थी उन्होंने ? यह उनसे नहीं पुछा मैंने। अंदाज़तन यह पता चला सभी उम्र के ख़ास मोड़ से गुज़र चुके मुकाम पर हैं ,इसीलिए वैलेंटाइन डे पर छुट्टी की उत्सुकता केवल छुट्टी भर के लिए थी या फिर किसी और संदर्भ में की गई टिपण्णी थी ? मुख्य द्वार के ठीक सामने जिस व्यक्ति का डेस्क स्थित था वहाँ एक महिला अपने कार्य में व्यस्त थीं।
मैंने भीतर प्रवेश कर थोड़ी देर बैठ कर सबको साँस लेने की फुर्सत दी ,और चारो ओर के ख़ुशनुमा माहौल की जाँच शुरू की. दो दो बार कंप्यूटर चालु बंद कर देने के बाद भी वह लॉगिन नहीं कर पा रहे थे और एक दूसरे से उनके कंप्यूटर का हाल पूछकर लंच टाइम होने का इंतज़ार करने लगे। बैंक जाए किसी कार्य से और कोई फॉर्म नहीं भरे तो लगता है दर्शन हुए और प्रसाद नहीं मिला ,वैसे मंदिरों में यह चल सकता है मगर बैंक में नहीं ,ताबड़तोड़ डिजिटलीकरण और करोड़ों मोबाइल धारकों के दौर में भी फॉर्म भर कर ही बैंक किसी कार्य में विश्वास करता है ,एक भौतिक साक्ष्य ज़रूरी है।
तो एक डेस्क पर पहुंचा तो उन्होंने दूसरे डेस्क के तरफ ऊँगली दिखाई ,जब वहाँ पहुँचा तो उसने तीसरे की तरफ ऊँगली दिखाई ,तीसरे ने तो यह कह दिया कि अभी बैंक खुला ही नहीं है। मुझे लगा किसी टूरिस्ट स्थल पर रह भटके हुए राही के जैसे मैं किसी अनजान राह में भटक गया हूँ ,और इस जीवन यहाँ से निकल पाना बेहद मुश्किल होगा। अंततः मैंने प्रभु का सहारा लेकर मैनेजर रुपी सर्वशक्तिशाली मूर्ति के कक्ष में प्रवेश करने का जोखिम लिया ,देव फ़ोन पर किसी को होम लोन के शर्तों की गुत्थी सुलझा रहे थे। मेरे प्रकट होने को उन्होंने वैसे ही नकार दिया जैसे लोग वैक्सीन के बाद मास्क या कार में मौजूद सीटबेल्ट। मैंने हार नहीं मानी। कार्य महत्वपूर्ण था ,और इसी बहाने मै भी लोन के शर्तों की अमूल्य जानकारियाँ मुफ्त में प्राप्त कर रहा था। जब उन्हें लगा यह ढीठ प्राणी नहीं गायब होगा तब उन्होंने अपने चेहरे के भावों में सवालों की रेखाएँ प्रकट की ,मेरी कहानी सुन उन्होंने अपने बैंक के नियम मुझे बतला लिए जो डेस्क पर मौजूद सिपाहियों ने मुझे समझाई थी ,ग्राहक देव है या असुर इसका फैसला मैंने चक्के वाली कुर्सी पर स्थापित मूर्ति के बुद्धिमानी पर छोड़ रखा था ,मगर होनी को कौन टाल सकता है। बाद में घर के प्रबुद्ध जनों ने मेरी नौसिखुओं वाली गलतियों पर एक शोक सभा का आयोजन किया।
दूसरे बैंकों के भी चक्कर काटने की इच्छा हुआ ,जहाँ बीस वर्षों से दुकान चलती है उस बैंक ने ठुकरा दिया तो बाकियों के क्या कहने ,जितने बैंक उतने अलग अलग नियम। अंत यह मालुम हुआ कि मेरा कार्य छोटे ब्रांच में नहीं बल्कि शहर के बड़े ब्रांचों में ही सम्पन्न हो पायेगा। अब किचन में रास्ते के लिए सत्तू और गुड़ ढूँढ रहा हूँ ,सफर लंबा होगा ,शायद दूसरे राज्य भी जाना पड़ जाए।
तब तक के लिए आप भी फील्ड विजिट पर निकलिए।
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