आधार निवेश का सम्मोहन

  १  विरोध में जीवन  मृत्यु में संगम  २  आक्रोश का हल  जीवन है सफल  ३  मर्यादा की लड़ाई  मुसीबतों की परछाई  ४  प्रयासों से परिवर्तन  जीवन के मूल्य चिंतन  ५  ऊर्जा की निधि  सम्मान की परिधि  ६  शब्दों के मेल  कर्मों के जेल  ७  विचार परिवार का सम्मलेन  आधार निवेश का सम्मोहन  ८  एक सफल जीवन  छुपा हो केवल चिंतन  ९  न हो कोई अभिलाषा  जीवन की परिभाषा  दुःख में घोर आशा 

भावविहीन लोगों की मनपसंद किस्से



सबसे प्रबल भाव मनुष्य के अंदर बदले का है ,न्याय का ही एक अंग है बदला। अनेकों उदहारण रोज़मर्रा के जीवन में देखने को मिलते हैं ,सिनेमा और किताब में वैसे किरदार भी खूब गढ़े और पसंद किये जाते हैं जो न्याय कर सकते हैं ,और अगर बदला ले सके स्वयं तो और अच्छी बात है। मनुष्य अपने ऊपर हो रहे अन्यायों का उचित बदला नहीं लेना जानता है इसीलिए नियम कानून तैयार किये गए हैं ,मगर जब वह भी व्यवस्था साथ न दे तो अन्य स्तंभ उभर आते हैं समाज में जो न्याय का दावा कर संसद भवन पहुँच जाते हैं। बदले के भाव में लिए गए फैसलों को सही करार देने के लिए कई कुतर्कों को सहारा लिया जाता है ,मगर भीतर भीतर तो स्वयं से झूठ नहीं बोल सकते। 


आदतन शिकायत करने से सुकून मिलता है ,समस्या के  निवारण में शिकायत भी एक महत्वपूर्ण अंग है , बार बार कई लोगों से अपनी शिकायत दुहराने से उसके रूप बदलते हैं ,और कहानी हर बार नई बन जाती है ,फिर हम थक जाते हैं अगर उचित लाभ नहीं मिलता। फिर अगले शिकायत के स्टेशन की ओर दौड़ पड़ते हैं। मित्र परिजन सबसे पहले शिकार होते हैं ,फिर आज कल तो इंटरनेट पर अनजाने भी बहुतयात में मिल जाते हैं। अक्सर ट्रैन में अजनबियों के साथ कई ऐसी बातें आपने कही होंगी जो करीबी मित्रों से बताने में हिचकिचाते होंगे। ऐसा क्यों  हैं ? करीबी मित्र के व्यवहार से परिचित होने के कारण उसके उत्तर का अंदाज़ा भी थोड़ा बहुत लगाया जा सकता है ,मगर ट्रैन के अजनबी के साथ ऐसी कोई स्थिति नहीं होती और ना ही उन्हें दोबारा मिलने का कोई खतरा। तो आप खुलकर नई ज़िन्दगी की बातें करते नज़र आते हैं जो करीबी से कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाते या फिर मौका ही नहीं मिल पाता है। 


युद्ध का परिणाम जो भी हो ,समाजिक प्रभाव बहुत गहरा और दुखों से भरा होता है , समाजिक चेतना धरातल पर पहुँच जाती है ,सबसे बुरा प्रभाव बच्चों पर होता है ,उनका बचपन एक दुःस्वपन की तरह जीवन भर उनके साथ चलता है। ऐसा रोज़ देखने को मिलता है मोहल्लों में ,परिवार में जहाँ पेरेंट्स आपसी विवाद में बच्चों को घसीट लाते हैं ,या फिर उनकी कोई परवाह ही नहीं करते। घरेलु युद्ध हो या फिर अंतराष्ट्रीय ,मनुष्य का विकास क्षीण होता है। 


संस्थाओं के निर्माण से पतन तक की कहानी लिखी जानी चाहिए ,ताकि लोग जान सके कि बदले की भावना जब प्रबल होती है तो कोई ताक़त उसे नहीं रोक सकती ,क्यूँकि फिर वह परिणाम के बारे में नहीं बल्कि अपने भावना को शांत करने में विश्वास करता है। 


अलविदा 


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