परिजनों का परामर्श सम्मेलन
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कभी न ख़त्म होने वाला युद्ध स्वयं से सदैव चलता रहता है ,किताबें जो पढ़ी नहीं गई हों ,खरीद का डब्बों में बंद हो किसी मुहूर्त के इंतज़ार में कोने में पड़ी रहती हैं ,कुछ समय बाद उनके खरीदने के उदेश्य को लेकर सवाल खड़े किये जाने लगे। कोई किसी की बात को सच मानकर रोज़ झूठी कहानी सुनता है ,समझता है पर करता कुछ नहीं। ऐसे ही कई महीनों बीतने के बाद एक मित्र से बात करने की ठानी ,पर उसने फ़ोन ही नहीं उठाया और मुद्दा वहीँ शांत हो गया। रास्ते में दो व्यक्ति मिले ,एक मोबाइल पर दो देशों के युद्ध के खबर देखकर आस पास के लोगों को युद्ध की गंभीरता समझाने में व्यस्त थे ,तो दूसरे व्यक्ति को इसकी भनक लगी तो उन्होंने दोनों देशों का इतिहास ही सुना डाला और अपनी शोध का परिचय यह कहकर दिया कि हमे भी ऐसी परिस्थिति के लिए सतर्क रहना होगा।
दो कदम चलने पर भविष्य का एहसास होता है ,आप समान्य प्राणी हैं ,कोई महत्वपूर्ण गुण नहीं ,जैसे फिल्मों में देखा वैसी आपकी दुनिया नहीं ,बिलकुल आम और एवरेज जीवन गुज़रेगा ,मगर इसका मतलब नहीं कि सपने देखना छोड़ दे ,हज़ारों ख्याली महल प्रतिपल तैयार होते हैं। यह आभास उम्र के एक पड़ाव पर तो आना ही था ,जो बातें बचपन में सुनी वह कई शर्तों और नियमों से बाँधी गई थी जो अब नज़र आती है।
आपदा में भी चुनाव ज़ारी रहे ,जब महामारी में चुनाव न रुका तो बाकी आपदाओं से क्या , सत्ता में काबिज दल को विपक्षी दल का डर नहीं आमजन के नाराज़ होने का खौफ सताता है , वैसे चुनाव रुकना भी नहीं चाहिए था , हाँ मगर , रैलियों का रूप बदलना चाहिए था। लुभावने वादे घोषणा पत्रों में सड़ते जा रहे हैं ,नदियाँ सूख रहीं हैं और गंदी हो रही , पेयजल संकट विकराल रूप में सामने आने वाला है ,पर चिंता से प्यास नहीं बुझती ,बदलाव के लिए व्यवहार में बदलाव आवश्यक है।
कल खिचड़ी बनाने के चक्र में बिरयानी बन गई ,इसका मतलब न खिचड़ी बनाने आती है न बिरयानी। तो ,जो बना वह इन दोनों के बीच का कुछ था। खैर ! जो भी हो ,स्वाद लाजवाब तो बंदा मास्टरशेफ। और फिर क्या ,रोज़ वैसे ही कुछ कुछ करने की होड़ लगी है किचन में अलग अलग सब्ज़ियों के साथ। यह दौर कब खत्म होगा , पता नहीं।
अलविदा।
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