किंचित द्वेष का दोषारोपण
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कनिष्ठ चिंताओं में डूबे जन रोज़ नए सपने देखते हैं ,फिर असल दुनिया में जाकर ज़िम्मेदारियों से भाग बैठते हैं। कल किसने देखा वाला डायलॉग मिठाई की तरह बाँटते फिरते हैं। सुबह ५ बजे से संगीत बज रहा है पड़ोस में ,कल किसी की शादी थी शायद ,कोरोना में छोटे से छोटे मौके भी नहीं गँवाना नहीं चाहते हैं लोग। मैंने भी पिछले माह एक छोटा पारिवारिक कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनाई थी ,मगर उसकी विफलता में कई जीवन अनुभव छुपे हुए थे जो आने वाले समय में समय समय पर उपस्थित होंगे। घर के बाहर जो बल्ब लगा था उसे किसी ने रात के अँधेरे में गुल कर लिया ,बल्ब तो बल्ब परदा भी उड़ा ले गया ,अब ऐसा कोई क्यूँ करेगा ? यह घटना दो साल पहले भी हुई थी ,हमारे घर के तुरंत बाद जिनका घर है उनका पर्दा और बल्ब सही सलामत है ,सुबह जब आंटी से पुछा तो उन्होंने कहा कि उन्हें लगा शायद पर्दा धोने की लिए उतारा गया हो ,मैंने कहा उनका यह सोचना लाजमी है। वैसे जिसने भी यह कार्य अंजाम दिया वह यह बखूबी जानता था कि कौन घर किसका है।
अब दो बार सस्ते १० रूपए वाले बल्ब बदल चूका हो पिछले तीन दिन में ,लगता वापस led वाला ही बल्ब खरीदना होगा। शायद उसको खरीदने की हिम्मत ये सस्ते बल्ब देंगे जब इनके स्वतः ख़राब होने की सँख्या १० के पार हो जाएगी।
यह सोचना कि सामनेवाला क्या सोचकर वह बातें कर रहा है जो आपको बुरी लग रही हैं ,तो यह सोचना बेकार है ,मनुष्य परिस्थतियों के हक़ में फैसला लेता है ,पहले स्कूल के दोस्त थे ,फिर कॉलेज के दोस्त आये ,अब वो भी चले गए तो ऑफिस के दोस्त आये ,ये जायेंगे तो ढलती उम्र के साथी मिलेंगे। बातें हो मगर नजरिया बिलकुल भिन्न हो तो पटरी सरपट तेज़ रफ़्तार विचारों को अक्सर जन्म देते रहती है ,जिससे खुश होकर इंसान नए दुनिया के तलाश में कहीं तारों के बीच खो जाता हैं।
किताबें हैं पर पढ़ नहीं पा रहा हूँ ,क्या कारन हैं ? कोई दुश्मन नहीं विश्व में स्वयं के सिवा ,सबकुछ औचक हो तो संभलने का वक़्त नहीं मिलता ,फिर अंतिम मोड़ में पहुँच पीछे मुड़कर सही गलत के चक्करों में पड़कर लोग पुराने रिश्तों को धूल बना स्वयं धूल बन जाते हैं।
अलविदा
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