हृदयगति परिवर्तन लोकार्पण का दिन
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हृदयगति परिवर्तन लोकार्पण का दिन
दोष है ग्रहों में ,कुंडली में दोष है ,कैसे बनती है कुंडली ,अब तो इंटरनेट आ चूका है हर हाथ में ,तो इसे बनाना क्या आसान है ,कोई भी बना सकता है ,महत्वपूर्ण प्रश्न है दोष क्या है ,कैसे फलित होता है ,क्यों ज़रूरी है कुंडली ,कौन मानता है कुंडली ,कोई क्यूँ विश्वास करता है ,गर आपको नहीं करना तो बेशक ना करे ,मानने वाले तो मानते हैं ,किसी के विश्वास का उपहास ठीक नहीं ,अन्धविश्वास हुआ तो , जब मानवीय चेतना और गुण के परिचायक समाप्त हो जाए तब क्या ग्रहों की चाल बदलती है ,कुछ ऐसा नहीं जिससे यह दोष मिट जाए ,ऐसे कृत्य हैं ,ऐसे पूजन विधि हैं ,जो किताबों में विदित हैं ,जिसे केवल कुछ लोगों ने ही पढ़ा है ,तभी तो अपने नाम के बाद वैसे टाइटल इस्तेमाल करते हैं ,उन्होंने वेद पुराण पढ़ा है ,गृह गोत्र नक्षत्र दशा दिशा राशि फल अस्त वक्र चाल चंद्र लग्न चाल सबका अध्ययन किया है ,आपने ज्ञान बाँटते हैं ,पढ़ने वाले नहीं पढ़ते ,या किसी और को पढ़ने नहीं देते ,प्रवेश नहीं करने देते अपने घरों में ,भेदभाव मानते हैं ,बड़े बड़े मकानों में रहते हैं जहाँ अपने लिए उन्होंने अलग लिफ्ट की व्यवस्था रखी है। इन्ही उच्च सोसाइटीज में कड़े नियम कानून होते हैं जो संविधान को नहीं पढ़ते ,बल्कि स्वयं का कानून मानते हैं ,डिलीवरी वाला व्यक्ति उस लिफ्ट में नहीं चढ़ सकता वार्ना जुर्माना भरना पड़ेगा ,घरों में बर्तन झाड़ू का कार्य करने वाले कर्मठ जन को भी इसी श्रेणी में रखते हैं ,उनके कार्य को समाजिक सम्मान देने से हिचकते हैं पैसे देना तो दूर की बात है ,उन पर रील्स बनाते हैं इंस्टा पर ,उनके मेहनत का अपमान करते हैं ,उनके एक्सेंट का उपहास करते हैं ,उनके उनके नाम से नहीं पुकारते हैं ,दूध वाले भैया ,चाय वाले भैया ,सब्ज़ी वाले भैय्या। कानून वाले भैया ,क़ैदियों की रखवाली करने वाले भईया ,जनता का पैसा लूटने वाले भैय्या ,गरीबों के हक़ मारने वाले भईया ,सड़क पर अपना व्यवसाय ठेले पर चलाने वाले से मोलभाव करने वाले भैय्या ,यह सब नाम नहीं पुकारे जाते। उनके भले कोई नाम हो इन्हे याद नहीं होता परन्तु अपने रिश्तेदारों के अजीबोगरीब नाम ज़रूर याद हो जाते हैं। यह कुचक्र सदियों का है ,इस पर बार बार अलग अलग रंग से पुताई कर नया माल बाज़ार में बेचने निकल पड़ते हैं ,भीतरी सोच और कार्यप्रणाली नहीं बदलना चाहते हैं ,समाजिक और पारिवारिक समरसता और ढाँचा टूटने का डर बताते हैं न्यायलय में जब महिलाओं के अधिकार और इच्छा की बात होती है ,जुर्म नहीं मैरिटल रेप यहाँ। खोखला ढाँचा भले हो ,एक वर्ग को तकलीफ भले हो ,चलने दो यूँ ही जब तक स्वतः ही बिखरकर समाप्त न जाए ,और जब हो जाए तो शोषित वर्ग को ही दोषी तय कर कहानियाँ लिखों ,फ़िल्में बनाओं ,गाने बनाओ, और बड़े कलाकार बनकर दाँत चियारो।
अलविदा
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