आधार निवेश का सम्मोहन

  १  विरोध में जीवन  मृत्यु में संगम  २  आक्रोश का हल  जीवन है सफल  ३  मर्यादा की लड़ाई  मुसीबतों की परछाई  ४  प्रयासों से परिवर्तन  जीवन के मूल्य चिंतन  ५  ऊर्जा की निधि  सम्मान की परिधि  ६  शब्दों के मेल  कर्मों के जेल  ७  विचार परिवार का सम्मलेन  आधार निवेश का सम्मोहन  ८  एक सफल जीवन  छुपा हो केवल चिंतन  ९  न हो कोई अभिलाषा  जीवन की परिभाषा  दुःख में घोर आशा 

विचित्र परिणाम का उत्कर्ष



चिंताओं से घिरा मनुष्य शाम को सड़क पर टहलता चला जा रहा है , वह बेसुध सा चला जा रहा है ,कोई एक चिंता है जो वह किसी को नहीं बताता ,जबकि वह जनप्रतिनिधि है ,रोज़ सड़कों पर धरने देता है और आमजन के हित के लिए सबकुछ न्योछावर करने को सदैव तत्पर है। पर वह एक चिंता है जो वह किसी को नहीं बताता ,नहीं उसका हल उसके पास है ,उसके साथी चेहरे पर देखकर सोचते हैं पर सीधे तौर पर पूछने से हिचकिचाते हैं ,क्यूँकि चुनावी मौसम है इसीलिए यह जनप्रतिनिधि बेहद व्यस्त है। परिवार वाले भी चुनाव प्रचार में ही लीन हैं ,किसी को किसी की खबर नहीं। घर में खाना सुबह तैयार होता है और सब निकल पड़ते हैं अपने अपने दौरे पर ,आज इस गली तो कल उस गाँव ,बहुत सोच समझकर और रणनीति के तहत तैयार चुनावी प्रचार अभी शुरू ही हुआ है। 


वह मनुष्य स्वयं को ठगा सा महसूस करता है ,उसकी पार्टी ने उसे मंत्री बनाया ,लोगों ने चुनाव में भी जीत दिलाई ,पर एक बार मंत्री पद पर आसीन होने के बाद उसने आँखों में पट्टी बाँध कोपभवन के बाहर पैर नहीं रखा। लोग साल दर साल इंतज़ार करते रहे कि नेता आवेगा ,पर वह नहीं आवे ,जब चुनाव नहीं आवे तो वो कैसे आवे। लोगों में चिंता बढ़ी जब वह चुनाव आने पर भी नहीं आया। तब लोगों ने सोचा कहीं उसने दूसरा गाँव तो नहीं चुन लिया इस बार के चुनाव में ,लोगों ने अपने खबरी दौड़ाया और सूचना मिली ऐसी कोई बात नहीं है। वह चुनाव और राजनीती से तंग आकर त्यागपत्र दे चूका है ,अब वह खेती करने लगा है। एक रिपोर्टर बहुत खोज बीन के बाद उसके पास पहुँचा तो सबसे पहले यही सवाल पूछा कि आखिर राजनीति छोड़ खेती में कैसे रूचि उत्पन्न हुई महानुभाव की। उसने कुछ भी कहने से इंकार किया और केवल इतना कहकर अपने कार्य में दोबारा जुट गया कि उसे भविष्य की चिंता है। 


आज कई सदियाँ बीत चुकी हैं ,सारा ग्रह मरुस्थल में तब्दील हो चूका है , कोई जीव जंतु के अवशेष नहीं बचे ,सभी दूसरे ग्रह की तलाश में निकले हुए चंद लोगों के इंतज़ार में दम तोड़ चुके हैं। मौत बेहद भयानक हुई ,कोई किसी से लड़ नहीं रहा फिर भी सभी मर रहे ,कोई किसी को मरते नहीं देख रहा फिर भी सभी मर रहे ,सब सामान्य है फिर भी सभी मर रहे। लौ बूझ गया तो लोगों ने सवाल करना शुरू किया कि आखिर ऐसा क्यूँ हुआ। सूरज बूझ गया ,ऊर्जा समाप्त हो गई उसकी ,नई ऊर्जा की तलाश नुक्लेअर पर अटकी रही ,मगर बहुत जल्द यह ऊर्जा सबको ख़ाक में मिलाकर मानवजाति पर विजय प्राप्त कर चुकी है। 



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