आखिर कैसे की इसने बड़ी इतनी बेवकूफी
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१
जुनूँ मौत का सीने में लिए चलो
मक़्तल की पुकार आँखों में भरो
२
भाव शब्दों के अब पिघलते नहीं
आसानी से धड़कने संभलती नहीं
समझा था जिसे मित्र ख़ास
वही कहते है
तुम तो हमे समझते ही नहीं
३
दिन और रात बाँट तो दिए
लोगों ने
बहुत बुरा किया अँधेरे के साथ
४
एक नाम सबका कोई कभी रखता है
प्रेम में प्रसन्न प्रेमी
दोबारा नामकरण आखिर क्यूँ करता है
५
पढ़ समझ ले सब
फिर क्या तकलीफ
गुज़रे यूँ दिन रात
नहीं यह उन्हें उम्मीद
६
इन्तेज़ारी जवाब का
खुमारी आनेवाले कल का
दुश्वारी बीत जाने वाले पल का
इन्ही सब में उलझता हूँ
७
प्रयोग शब्दों का
विचारों से अलग
कोई और मायने निकाले हम लोग
क्रांति झूठी हो
साथ सच्चा हो
ऐसा हो हम अपनों को ही नहीं याद आये कभी
८
लिखते रहने की है मजबूरी
कम न हो शायद ये दूरी
मान लेना हार अपनी
जीत सबसे बड़ी है मेरी
९
प्रत्यक्ष दर्शन की ख़ुशी
लोग ताकते हों दुखी
कैसे मौका मिला
आखिर कैसे की इसने बड़ी इतनी बेवकूफी
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