जो आया यहाँ तो कुछ ठोकरे सबके हिस्से आई
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एक रात एक अलख जगाई
सोचो की सबकी मौत आई
मान तो हमने भी लिया था
तुमको ही न दिया सुनाई
मतलब कुछ समझने की जल्दी ना करना
ज़िन्दगी शुरू से अंत तक है केवल बेवफाई
उम्दा ख्यालों के सफर सुबह तय किये मैंने
रात बैठ कर अजनबियों में झूठे कसमें खाई
मुश्किल है अपने आप में ऐसे यूँ ही उलझे रहना
लोग तो कहते रहे ऊपर वाले की माँग रहनुमाई
आदतन मजबूर हूँ, छुपाता नहीं ज़ख्म अपना किसी से
बस अंदाज़ बयाँ करने में हमने ज़रा की रस्म-अदाई
हिस्सों में बाँट कर उम्र तमाम हम यूँ ही जीने लगे
जैसे माँग ली फ़िज़ा की हर एक बहारों से रुसवाई
मत देख क्या रंग होगा उम्र के आखिरी मुहाने पर
जो आया यहाँ तो कुछ ठोकरे सबके हिस्से आई
एक ख्याल मिलता नहीं घूमता हूँ चारो ओर
वरना क्या बात थी! क्या घर नहीं मेरे चारपाई
अनाम, आला अधिकारी किताबों में बसने लगे
टूटी सड़क भूल फ़िज़ूल मुद्दों पर बहस छिडाई
हमको किसका डर हमको किसकी फ़िक्र
जिससे माँगी थी उम्र उसी ने कब्र खुदवाई
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