मुक्ति का द्वार
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मुक्ति का द्वार
एक बंद कमरे में
खुद को तलाशता
रोज़ लड़ता खुद से
खुद को हूँ सवाँरता
खुद से खुद की ही लड़ाई
खुद ने ही चोट है खाई
पर मैं हूँ देखता एक स्वप्न
बंद कमरे में कैद कीड़े
भटकते अपने गृह से दूर
तलाशते मुक्ति का द्वार
एक छिद्र किरण की
जो बताये रास्ता
जहाँ से भटकते आ गए अँधेरे में
हर तरफ मोटी दीवार है
घर दीवारों को बनाना होगा
जो मिल गया उसमे मुस्कुरना होगा
पीछे जो छूटा उसको भुलाना होगा
वर्तमान में जीना होगा
पंख हुए कमजोर
हाथ दुखते हैं
बहुत जोर से भरी हवा नीचे पंखों के
बहुत देर तक किया टाइप शब्दों को
जो ना उत्तर दे सकते थे
उनको प्रश्न करता रहा रोज़
मैं हूँ एक द्वार खड़ा
जहाँ अँधेरा मुस्कुराता
अपनी शक्तियों पर इठलाता
दिये को मेरे धिक्कारता
मेरा वजूद को नकारता
ऐसी शक्तियाँ तिलस्म बनकर टूटती हैं
कमजोर मन को और कमजोर करती हैं
एक कमजोरी भीतर है मेरे छुपी
सच बताने में उम्र सारी मेरी ढली
सच झूठ बराबर कर सड़कों पर
तलाश एक आईने की
चेहरा जो दिखाए
मेरा और मेरे समाज का
मन और मेरे सोच का
हरकत और मेरे मर्ज़ का
टूट बनकर पत्थर
बह बनकर निर्झर
अर्थ चित्त संसार
मोह में डूब कर
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