नर्तकों की कहानी
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१
वक़्त बेवक़्त बात बकवास करता है
लम्हा एक बीता उसी को याद करता है
२
मानो सच सब कहे अगर
होगा क्या सबके भीतर
३
मूढ़ बना ग्रहण किये सब ज्ञान
क्रूर बन फैलाता जग में त्राहिमाम
४
पुजारी लाशों पर रोता है
पथ कैसा किसको कौन दिखलाता है
जो गुज़रा वो किसी को न भाता है
५
मार्गदर्शक बन राहों में मिले
जब गुज़र गए तो बड़े दिल जले
६
मेरे सारे खेल दूसरों के बनाये हैं
मेरा अपना सब मेरे स्वप्न में है
७
रात आवाज़ से चौंक जगा
पूछा किसी ने हाल तो भगा
८
हर भाव पर विजय की कामना थी
मुर्ख सबको जीना ही यातना थी
९
एक विचार को मथकर बोझिल होता हूँ
लोग पूछते हैं
मैं दिन भर क्या करता हूँ
कौन समझे
यूँ तो सभी समझते हैं कि
जिस तराजू में हैं तौलते मुझे, उसमे मैं नहीं तुलता हूँ
अरमानों के जो पहाड़ दिन में खड़े करता हूँ
रातों में उन्ही में छुपकर सोया करता हूँ
मोह माया के जाल मनःस्थल पर विचरते हैं
वो चुप सुनते हैं ,मैं लगातार पूछा करता हूँ
आयेगी एक काली रात मुझको लेने एक दिन
उसी के इंतज़ार में दिन भर तन्हा रहता हूँ
ज़िंदादिली शब्दों में समाती नहीं आज कल
मैं खुद को ग़मज़दा हर पल पाया करता हूँ
१०
एक अलग राह में जो चलने की ज़िद्द है ,उससे क्या होने वाला हैं
भीड़ में नहीं ,जब अकेले होता हूँ ,लोग पूछते हैं ,क्या बदलने वाला हैं
सवालों की संदूक अब सँभलती नहीं मुझसे ,अब मैं रोने वाला हूँ
मुद्दतों किसी चीज़ के इंतज़ार में रोया ,अब मिला ,तो मैं हँसने वाला हूँ
क्या कल तुझसे हम दूर हो जायेंगे ,तूने जो न कहा ,मैं वो सुनने वाला हूँ
यूँ ही तो इबादत होती है ,मानता था पहले ,अब मैं पूछने वाला हूँ
११
किस मोड़ पर है वो मंज़िल जिसकी तलाश हमे बरसों से
हर मोड़ से मुड़कर देख आये हम कोई नहीं वहाँ कब से
तालाब के शिकारी आकाश में नज़र टिकाये तैरते हैं
कुछ टूटकर गिरने का उन्हें है इंतज़ार सदियों से
१२
सच मानकर सबकुछ पढ़ लियामैंने
झूठ मानकर सब नकार भी दिया
यह किस्मत कैसी बोलो मेरी
जो साथ अपना दे रहा था बचपन से
उसी एक गुण को हमने ठुकरा दिया
१३
नर्तकों की कहानी ,किसी ने न सुनी उनकी ज़ुबानी
देख मंत्रमुग्ध थे सब ,आँखों में छुपा था सबके पानी
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