दैनिक क्रियाकर्म भाग १२५४६४६६
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कहाँ है वह शहर जिसे ढूंढता है हमारा मन ? वह कहीं नहीं है , कहीं नहीं से मेरा मतलब , वह किसी बाह्य स्थान पर नहीं है , वह तो सबके अंदर विराजमान है। जिसे हम सबको व्यवस्थित करना पड़ता है , वो केंद्र से विचलित होता रहता है। हाल ही में , मैंने वाल्मीकि जी की पुस्तक "जूठन " पढ़ा , जिससे मैं बहुत दिनों से पढ़ना चाह रहा था , मगर वह कहीं मिल नहीं रही थी।
अपने लेखक बनने की जो कहानी उस पुस्तक में है , उसने मुझे एक नयी ऊर्जा प्रदान की , कि कैसे उस वक़्त जब इंटरनेट नहीं था , लोग चिठ्ठी से वार्तालाप करते थे , और तो और अपने कृतियों को छपाने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती थी , कितनी बार वाल्मीकि जी को रिजेक्शन का सामना करना पड़ता था जो काफी वक़्त बर्बाद कर देता था क्योंकि आज के जैसा सबकुछ तुरंत नहीं होता था कंप्यूटर पर।
कितनी सुविधाएँ हो गई हैं आज , और कितना ग्रांटेड हम लेते है , हालॉकि जिन लोगों ने वह दौर नहीं देखा है , जो इंटरनेट में ही पैदा हुए और पले -बढे उनके लिए तो सब आसान और नार्मल ही लगता है।
एक और लेख पढ़ा आज संतोष देसाई का, जो की बहुत अच्छे कॉलम लिखते है , उनकी नज़र और सोच का प्रशंसक मैं स्कूल के दिनों से ही हूँ। उन्होंने लिखा है, इस महामारी के दौर में जब हम सब घर में क़ैद है पिछले ६ महीने से, तो हम कितना मिस कर रहे है अपनी रोज़मर्रा के जीवन को , जिसमे हम रोज़ स्कूल , कॉलेज या ऑफिस या मॉल या रेलवे स्टेशन जाया करते थे और कितना नफरत करते थे वह फैले लोगों के भीड़ को और गन्दगी को , मगर आज हमे वही याद आ रहे है।
दूसरी बात उन्होंने लिखी की हमे शुक्रगुज़ार होना चाहिए की यह महामारी इस डिजिटल दौर में हुई है वरना किसी और दौर में इसका असर कई गुना और घातक सिद्ध हो सकता था , कम से कम डिजिटल दुनिया ने हमको सहारा दिया जहाँ हमलोगों ने एक पास समानांतर दुनिया है। कितने लोगों को यह आभास ही नहीं हो रहा होगा, जैसे कुछ महामारी है इस दुनिया में। बहुत हद तक डिजिटल ने हमको एक सेफ जोन दिया है, जहाँ जाकर हम सबकुछ भूल जाते है। हाँ , मगर इसके भी दुष्परिणाम अब देखने को मिल रहे है।
देसाई जी का कहना है , डिजिटल हमे फिजिकल दुनिया का सुख नहीं दे सकता , हम पहले फिजिकल बीइंग है इसलिए डिजिटल के साथ साथ असल दुनिया भी हमारे लिए बहुत ज़रूरी है। यह बिलकुल सटीक और सही बात है। यह दुनिया जो की धीरे धीरे डिजिटल में परिवर्तित हो चुकी है , यहाँ ज़रूरत महसूस हो रही है असल दुनिया की।
पिछले कुछ दिनों से मैं तमिल भाषा सिखने का प्रयास कर रहा हूँ , इसके कुछ महत्वपूर्ण कारण हैं और सबसे पहला है संगीत , संगीत एक ब्रिज है जिसने मुझे जर्मन भी सीखने की प्रेरणा दी , हालाँकि यह अलग बात है की मैं अभी तक जर्मन सीख नहीं पाया हूँ, कितनी कोशिशों के बाद भी। तमिल संगीत ने काफी प्रभावित किया है पिछले कुछ वर्षों में , और दूसरा कारन यह है की दक्षिण भारत के किसी भी भाषा का ज्ञान मुझे नहीं है , तो शायद तमिल के बहाने ही कम से कम एक भाषा तो जान जाऊँ , बाकी उसके बाद देखेंगे।
और हाँ , इसी दौरान मुझे पता चला , तमिल बहुत ही प्राचीन भाषा है शायद हिंदी , पाली और संस्कृत और प्राकृत से भी पुरानी , तमिल साहित्य और कला का अपना अलग इतिहास है और भाषा एक द्वार बन सकता है। उम्मीद तो यही है इसे लगातार सीखने के प्रयास करूँ , फिलहाल तमिल संगीत २४ घंटे सुन रहा हूँ , ८० के दशक से लेकर आज तक के हर प्रकार के संगीत। खासकर तमिल संगीत में मधुरता के साथ साथ स्वर और बीट भी प्रचुर मात्रा में हैं , और वे सभी ऑथेंटिक और नए लगते है भले वाद्य यंत्र पुराने हों.
पड़ोस की एक महिला ने कोई व्रत रखा है , उन्हें चाची कहता हूँ मैं , वैसे उनसे मिलना तो कभी कभार ही होता है मगर उम्र और अनुभव से यह शब्द उचित है। अनुभव इस स्थान का , जहाँ मैं कुछ सालों से और वो कई सालों से रहती हैं। हाँ , तो किस्सा यह है कि , उनकी पुत्री छत पर कोई लकड़ी उतार रही थी , कोई शाम के ५ बजे होंगे और मैं अभी सो कर उठा था और बाथरूम जा रहा था , तो उसने बगल के घर में लगे अमरूद के पेड़ की बात की और उस घर चाभी मांगी ताकि अमरूद तोड़ सके अपनी माता के लिए जो की कल या आज उपवास कर रहीं है।
मेरा उत्तर था की अमरूद तो सब ख़त्म हो गए जो भी पके थे , कुछ पक्षियों ने खा लिया और बाकी पककर गिर गए. मगर उनका कहना था कि कुछ अमरूद हैं अभी पेड़ के ऊपरी ओर , तो मैंने कहा ठीक है जैसी आपकी इच्छा। यह घटना महत्वपूर्ण क्यों है ?
करीब २ सप्ताह पहले मैंने उनसे वही पके अमरूद उन्हें देने की बात कही थी , मगर उनका कहना था कि उन्होंने खुद २ किलो पास के मंदिर के पुजारी को सौंप दिया क्योंकि वायरस का खतरा है। तब मैंने सोचा की ठीक तर्क है पर आज कुछ संदेह है,\
धन्यवाद
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