आधार निवेश का सम्मोहन

  १  विरोध में जीवन  मृत्यु में संगम  २  आक्रोश का हल  जीवन है सफल  ३  मर्यादा की लड़ाई  मुसीबतों की परछाई  ४  प्रयासों से परिवर्तन  जीवन के मूल्य चिंतन  ५  ऊर्जा की निधि  सम्मान की परिधि  ६  शब्दों के मेल  कर्मों के जेल  ७  विचार परिवार का सम्मलेन  आधार निवेश का सम्मोहन  ८  एक सफल जीवन  छुपा हो केवल चिंतन  ९  न हो कोई अभिलाषा  जीवन की परिभाषा  दुःख में घोर आशा 

वर्षो का अनुभव

 

वर्षो का अनुभव 

जीवन चिंतित होकर नहीं बिताना चाहिए --तनिक देर से समझ आता है ,जब तक समझ आता है तब तक यही छवि बनी रहती है कि चींटी की भांति सदैव व्यस्त रहना सफलता की निशानी है और हो भी क्यूँ न जब बचपन से ही हमेशा इसी की तालीम दी जाती है। स्कूल में वार्षिक परीक्षा पास करने की तैयारी -स्कूल से निकल कॉलेज में दाखिले के लिए तैयारी --कॉलेज से निकल नौकरी के लिए तैयारी -फिर एक दूसरे कॉलेज की तैयारी -फिर नौकरी में प्रोन्नति के लिए तैयारी। सदैव मस्तिष्क चालू रहना चाहिए -मगर वैसे मानव जी नहीं सकता ,आप रोज़ कैसे ब्रश करते हैं और कैसे भोजन करते हैं इस पर अधिक ध्यान केंद्रित नहीं करते ,यह  जीवन का हिस्सा बन चूका है मगर कुछ नई चीज़े को हिस्सा बनाने में समय लगता है --और इस बदलते माहौल में यह समय घटता जा रहा है और चीज़े बढ़ती जा रही हैं। सफलता का कोई ठोस मापदंड नहीं है --यह बहुत देर से समझ आता है ,इंतज़ार में उम्र गुज़र जाती है --फल पाकर खुश होने की आदत बन चुकी होती है। 


एक के बाद एक पड़ाव पार कर पता चलता है ख़ुशी कहीं नहीं है --और हर जगह है खासकर वहाँ जहाँ आपको लग रहा था कि यहाँ तो कतई नहीं हो सकती --केवल दुखों के सागर से गुजरने वाले में एक अलग नज़र विकसित हो जाती है--वह हर परिस्थिति में वही नज़र लगाकर नापना शुरू कर देता है। तकनीक ने मस्तिष्क को सदैव एक्टिव रहने की लत लगा दी है --दिन भर कुछ न कुछ स्टिमुलस चाहिए -कुछ नया -कुछ अनोखा -पहले वाले से अधिक मज़ेदार , मगर एक समय आता है जब मस्तिष्क अपनी क्षमता के निकट पहुँच जाता है --और ब्रेकिंग पॉइंट आ जाता है। तब आप विश्राम और ब्रेक लेने की सोच आँखे बंद कर बर्बाद समय को अपने ख्यालों  दोहराते हैं --वहाँ पहली बार वाली फीलिंग्स ढूँढ़ने की कोशिश करते हैं ,पर अफ़सोस ऐसा नहीं हो सकता --हर चीज़ बार बार पहली बार की तरह नहीं अनुभव की जा सकती है। और ,यहीं संतोष का जन्म होता है। 


यह जानना बेहद ज़रूरी है कि एक पल में भी पुरी ज़िन्दगी जी जा सकती है। 



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धारदार अंग्रेजी बोलने वाले जब हिंदी में बोलने का प्रयत्न करते हैं ,तब उन्हें सभी सपोर्ट करते हैं और कुछ लोग तो ये मान लेते हैं कि ये एहसान कर रहे हैं उन पर --और तो और वो हिंदी बोलने के पहले अपनी हिंदी न बोल पाने की असमर्थता को एक विकार नहीं बल्कि पुरस्कार के रूप में प्रदर्शित करते हैं। वही हिंदी(अंग्रेजी छोड़कर कोई भी भाषा) बोलने वाला जब टूटी फूटी अंग्रेजी में बोलता है तब उसे हीनभाव से देखा जाता है ,और सदी के महानायक ट्विटर पर सलाह देने लगते हैं  --कितने खिलाडियों का मज़ाक भी बनाया जाता है उनकी अंग्रेजी न बोल पाने को लेकर। यह रोजगार और बाकी क्षेत्रों में कैसे असर करता है इससे तो सभी परिचित हैं। आपके भाषा(कोई भी हो) को लेकर एक हीनता पैदा करना ही उनकी(कोई विशेष व्यक्ति नहीं) सबसे बड़ी उपलब्धि है। बिलकुल यही फार्मूला गोरा करने वाली क्रीम कंपनी अपने प्रचार प्रसार में अपनाती है --आपको पहले हीन अनुभव करवाएगी फिर अपना माल बेचेगी। यह गलत तरीका प्रचार का। 



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