the great indian kitchen
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द ग्रेट इंडियन किचन
इस साल रिलीज़ हुई फिल्मो में सबसे अधिक चर्चा गर किसी फिल्म की हुई है तो वह यह यह फिल्म, मलयाली फिल्मों का प्रभाव बाकी सिनेमा पर भी पड़ना शुरू हो चूका है ,मुख्य किरदारों के प्रभावशाली अभिनय जो बिलकुल सरल लगते हैं पर बेहद गंभीर असर करते हैं। परिवार समाज का एक मुख्य यूनिट है और शादी एक तंत्र जिससे सबकुछ बैलेंस किया जाता रहा है सदियों से खासकर यहाँ ,अब उसमे कैसे कैसे धारणाये जमा कर रखीं है जो इसे अंदर से खोखला बनाये जा रही हैं ,पर उनपे ध्यान देने के बजाय कुछ लोग उन लोगों को ज़िम्मेदार ठहराना शुरू कर देते हैं जो इन कमियों की ओर इशारा करते हैं। यह सफर सदियों का इतनी आसानी से नहीं बदलने वाला ,पर इसमें पीसने वाला केवल एक नहीं सभी हैं।
कहानी कुछ नहीं है फिल्म की ,और देखा जाए तो सबसे मजबूत कहानी है ,ऐसा लगे की किसी ने आम मिडिल क्लास परिवार के किचन में कैमरा रखकर पूरी फिल्म शूट कर ली है और इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत भी यही है बिलकुल आम अनुभव को एक अलग नज़रिये से देखने का प्रयास करती है यह फिल्म ,वह अनुभव जो अधिकतर पुरुष रोज़मर्रा के जीवन में अनदेखा करते हैं क्यूँकि वो जो सब मेहनत कर रहा है वही अनदेखा रहा है हमारे समाज में आज तक। कहानी है कि एक महिला का विवाह होता है और वह अपने नए जीवन में खुद को कहीं नहीं पाती है ,उसका अस्तित्व विवाह के बाद मिट सा जाता है ,और अंत में वह एक दिन अपने आप को पाने का प्रयत्न करती है और सफल हो जाती है जैसा अनेकों महिलाएं असल जीवन में नहीं कर पाती हैं ,इस फिल्म में हर चीज़ को बेहद सरल और आम तरीके से पेश किया गया है कि आपको पता न चल सकेगा की दोषी कौन हैं पुरे तंत्र में और मुख्य किरदार के आपत्तिजनक परिस्थिति का ,पीढ़ियाँ ज्ञान पढ़ा गई इसीलिए हम बिना सवाल किया माने जा रहे हैं। महिलाओं से जुड़े हर मुद्दे को जगह मिली है फिल्म में ,एक अनदेखा फॅमिली मेंबर से लेकर एक अनपेड लेबर जो पूरी जीवन केवल दूसरों के लिए जीता है ,कई संवाद फिल्म में कई बातें कह जाते हैं वैसे संवाद फिल्म में हैं बहुत कम क्यूँकि दृश्य ही सब कुछ कह देती है की कुछ सुनने को रह नहीं जाता।
महिलाओं के पीरियड्स के समय अलग अलग रीती रिवाज जिसका क्या लॉजिक है वह कोई नहीं बता सकता ,कोर्ट में हाल ही में सबरीमाला मंदिर को लेकर बड़ा फैसला सुनाया था ,यह फिल्म आपको(पुरुष) आपके व्यवहार को एक नया नजरिया पेश करेगी जिसे शायद आज तक हम भूलते आ रहे थे ,और शायद भूलते भी रहे।
कुछ दृश्य हैं जो बेहद आम लगते हैं रोज़मर्रा के जीवन में पर गौर करने पर उनके पीछे का सच अजीबोगरीब लगता है ,जैसे घर में पति का पिता अपना ब्रश भी नहीं उठाकर लेता है जबतक उसकी पत्नी या बहु उसे उसके स्थान पर जाकर न दे दें ,या फिर पीरियड्स के समय घर के बाहर रहने के लिए और किसी से सम्पर्क में न आने के लिए खासकर जो किसी पूजा या तीर्थ का दर्शन कर रहे हैं ,और भी ऐसे हज़ारों नियम हैं जिनसे रोज़ सामना होता हैं महिलाओं का, और कोई नहीं जानता उनकी मन की बात। पुरे समाज की लज्जा और फाउंडेशन की जिम्मेदारी महिलाओं के ही कन्धे पर क्यों हैं ? अंतिम दृश्य में एक लड़का अपनी माँ से पानी माँगता है ,माँ लड़के की छोटी बहन को पानी लाने के लिए कहती है ---अगर आप समझना चाहे तो पुरे फिल्म का सार बस इसी एक दृश्य में समाहित है। पितृसत्तामक सोच समाज में घर से ही शुरू होती है और वहीं ख़त्म ,उसने घरों में और हमारे दिमाग में इतनी अंदर घर किया है कि इसको कॉन्ससियसली एकनॉलेज करना ही बहुत लोगों के बहुत बड़ी बात होगी ,इसमें बदलाव और बराबरी की बात करना बेमानी होगी फिलहाल ,क्यूँकि इसको एकनॉलेज करने में ही कई कठिनाईओं का सामना करना पड़ता है।
इस फिल्म को सभी आलोचकों ने सराहा है ,और बेहद महत्वपूर्ण फिल्म बताया है ,जो कि यह फिल्म है। सवाल यह उठता है की कितने सवाल उठेंगे और कितना बदलाव होगा ? पर एक फिल्म कितना बदलाव करती है ,सवाल यह नहीं होना चाहिए ,बल्कि इसको भी अच्छे प्रयासों में किया गया एक और प्रयास माना जाना चाहिए ,क्यूँकि न एक दिन में बदलाव आएगा और न एक फिल्म से क्रांति ,पर जागरूकता की सुई ज़रूर चलती और बढ़ती रहती है ऐसे प्रयासों से ,और जहाँ तक बदलाव का सवाल है वह हमे अपने आप से पूछना चाहिए न कि समाज से ,क्या हम अपने आदतों में बदलाव लाने को तैयार हैं ,क्या हम समझने और सुनने को तैयार हैं ?
इसी बात पर एक दृश्य याद आता है फिल्म का ,जिसमे घर के पुरुष महिलाओं को आराम देकर किचन में रात्रि भोज बनाने का प्रस्ताव रखते हैं ,चिकन करी बन कर खा लेने के बाद किचन की हालत ऐसे होती है जैसे किसी बिल्ली ने किचन में घुस कर तबाही मचाई हो ,पर पुरुष के अनुसार अब तो कुछ रहा नहीं किचन में करने को क्यूँकि उन्होंने खाना जो बाना दिया आज ,तो किचन को फिर से नोर्मालिज करने की ज़िम्मेदारी महिला पर आती है ,शायद यही कारन है कई महिलायें पुरुषों के खाना बनाने के प्रस्ताव ठुकरा देती हैं।
किचन तो केवल एक टूल मात्र है ,ऐसे कई जगह हैं जहाँ कोई विकल्प नहीं हैं घर की महिला के लिए ,जैसे नौकरी के लिए परमिशन और बिस्तर पर। ये कहूँ सबको देखनी चाहिए यह फिल्म तो अजीब लगेगा क्यूँकि यह फिल्म हमने हज़ार बार देखी है ,बस उस नज़र से नहीं देखा जिस नज़र को तलाश करने का प्रयास यह फिल्म करती है और सफल भी होती है। कई महिलाओं के लिए इस फिल्म में नया कुछ नहीं था देखने को क्यूँकि यह उनकी रोज़मर्रा के जीवन का ड्रामटाइजड चित्रण हैं। पर देखनी सबको चाहिए।
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