मैं दिनकर प्रेमी हूँ
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नमस्कार
मैं दिनकर प्रेमी हूँ ,उनकी कुछ पुस्तकें पढ़ी हैं और बहुत लोग उनके प्रशंसक हैं यहाँ। साहित्य का जितना विस्तार किया जाए ,या जब हम उसे परिभाषित करते हैं तो गलती करते हैं ,बंधनों में बाँधते हैं तब गलती करते हैं। एक प्रकार के भोजन से स्वास्थ्य में गिरावट शुरू हो जाती है ,उसी प्रकार हमारे मानसिक विकास के लिए अलग अलग कवियों और लेखकों और भाषाओँ का ज्ञान आवश्यक है।
कितने अनुभव हमे किताब से बाहर मिलते हैं ,मगर यह बात हम उस वक़्त नहीं जान पाते हैं. फिल्मे देखकर लगता है कितना झूठ दिखते हैं सब ,पर कई बार आप असल जीवन के अनुभव बताएं तो लोग आपको अविश्वास की नज़रों से घूरते हैं। सब खाई हमारे भीतर बसी हैं। फ्रैंकोइस ट्रुफत के सिनेमा कम लोग देखते हैं ,उनके फिल्मों में काफी लम्बे शॉट्स होते हैं जहाँ कुछ ख़ास "ड्रामा " नहीं होता नज़र आता , १९२० -३० के फिल्म थेओरिस्ट के अनुसार फिल्मों को रियलिटी बदलने का माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया गया ,पर कुछ यूरोपियन फिल्मकारों ने इसके विपरीत अपनी अलग राह बनाई। उनके अनुसार रियलिटी ही सिनेमा हैं ,सिनेमा में जितना रियल हो सके उतना लोगों को निर्णय लेने का मौका मिलेगा।
ऐसा ही कुछ मैंने नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी के एक इंटरव्यू में सुना था ,जिसमे उन्होंने केवल वाद्ययंत्रों के संगीत सुनने के पीछे कारन बताया था ,उनके अनुसार गीत में लिरिक्स देकर लेखक ने एक बंधन बना दिया है ,और जब आप वैसे गीत सुनते हैं तो आप वही अनुभव कर पाते हैं जो गीत के शब्द आपसे करवाना चाहते हैं --यह उल्टा भी हो सकता है।कई लोग या फिर अधिकतर लोग अपने मनोदशा के अनुसार गीतों का चयन करते हैं।इमेजिन करने की आज़ादी देता है इंस्ट्रुमेंटल संगीत।
क्या आप अपने अनुभवों को नये सिरे से नहीं देखते हैं गुज़रते समय के साथ ? अक्सर हम ऐसा करते हैं बिना सोचे हुए ,लगातार एक नए "पर्सपेक्टिव " के तलाश में रहते हैं जिससे मन में उतपन्न सवाल शांत हो सके ,और हम चैन से कर्म कर सके या वर्तमान में निश्चिंत होकर शराब पी सके। यह "डिजायर " हमे कई बार ऐसे विचारधारा को समर्थन करने के लिए मज़बूर कर देता है जिसके सब पहलुओं को हम ठीक से समझ नहीं पाते हैं कर मैदान में कूद पड़ते हैं , फिर कुछ देर बाद निराश होकर घर को लौट आते हैं।फिर उस अनुभव को अलग अलग नज़रिये से देखने के जद्दोजहद में समय गुज़ारते हैं।
अक्सर अधिकतर बंधन केवल हमारे मन में ही उपस्थित होते हैं ,लाख कोशिश के बाद भी वो असल जीवन में नहीं आते ,पर इसका असर यह होता है की बहुत समय नष्ट हो जाता है। इससे बुरा यह होता है कि यह सब जान जाने के बाद भी हम अपना केंद्र बदले नहीं।
ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की पुस्तक "जूठन " अनिवार्य पाठ्यक्रम होना चाहिये , साहित्य और समाज के प्रति हमारे चेतना में नयी ऊर्जाका संचार करती है यह पुस्तक ,उनकी कवितायेँ पढ़ कर मैंने बहुत कुछ सोचा और अनुभव किया।श्रीलाल शुक्ल जी की "राग दरबारी " प्रसिद्ध पुस्तक है ,जिसे मैंने इस साल पढ़ा ,और लगा कोई फिल्म देख रहा हूँ जिसमे शुक्ल जी ने सबको बुलाया है भारत दर्शन के लिए।
धन्यवाद
शुभ रात्रि
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