हर मोड़ पे सिक्के लिए खड़े है , ख़ुशी छुपाई गयी है
मौत का बुलावा है , ज़िन्दगी भुलाई गयी है
सब दर्द का मर्म यही है , कि जिए जो कुछ पल, वही सब है
भागते राहो में हमने सब खो दिया , मौत का हिस्सा केवल बचा है
सच कहो , क्या मांगते हो , अंतिम घडी का हाल क्या है
ले जाओ अपने साथ कुछ सिक्के , सौदा करो अपनी ज़िन्दगी का मौत से
क्रोध का पंक पराजित होगा , सत्य का असत्य साबित होगा
फैसले न्याय के बदले जायेंगे , अन्याय सबपे हावी होगा
अपना अर्थ तय कर लो , तुम्हारा समर्थ प्रताड़ित होगा
कामना करो मत देवता से , उन्ही की इच्छा से सब हासिल होगा
करो कर्तव्य , मत करो फल की चिंता , होगा यही और कुछ न अन्यथा
करेंगे हम काम अपना , निभाओ कर्तव्य सब अपने
हमारा फल हम ही भुगतेंगे , कर रहे जो, वो हम ही सहेंगे
लिया क्या तुमसे जो तुम रोते हो , दे रहा हूँ मौत ,अब आज़ाद हो आप से।
जो मिला ज़िन्दगी से, वही लौटा रहा हूँ , मौत तेरे घर मैं आ रहा हूँ
उठाओ हाथ स्वागत में मेरे , कर रहा हूँ आज जो अपनी मर्ज़ी से
करोगे कल तुम बेगरजी से , यही सत्य है बतला रहा हूँ
जाते जाते भी तुम्हे ज्ञान दिए जा रहा हूँ। मेरी मौत का मत मातम मनाना
जलाकर मुझे घर ख़ुशी से लौट जाना , है यही सच ,होता रहा है यही
चंद लम्हो के आँसू है सभी
फिर तुम्हे भी काम कई है , लूटा है जो दुसरो से उसको छुपाना कहीं है
इसी में सारी उम्र जायेगी ,मगर एक दिन तुम्हारी बारी भी आएगी
किसको जवाब कैसे देना है , जो भीतर है , हमे ही सहना है
कब , क्या, क्यों , कैसे, किया भला , मतलब नहीं इन बातों का अब रहा
शर्म वापस घर को आएगी , मौत में काम तुम्हारे न आयेगी
ज़िन्दगी भर दुत्कारते रहे , मौत के घर अब मिल रहे।
आंतक तुम्हारे लूट का अब ख़त्म होगा ,मगर तुझ जैसे हज़ारो पैदा होगें
ये सिलसिला रुकता कहाँ है , ये दास्ताँ जग सुनता कहाँ हैं
मर्ज़ सब बीमारियों का घर में छिपा है , पाताल लोक जाके तू रुका है
आके देख अपने अंदर ,मिलेगा मोतियों से भी एक मन सुन्दर
२
कुछ सुनाओ की रात बीते , मौत का हर विचार बीते झूठ का अंधकार बीते , युद्ध की हर रात बीते
कहानी उन लोगो की, जो जीवन जिया करते थे
परायों को अपना किया करते थे , खेतों में ज़िन्दगी उगाया करते थे
बच्चो को कहानियाँ सुनाया करते थे
सच को सच और, झूठ को झूठ बताया करते थे
हिंसक पशुओ को अहिंसा का पाठ पढ़ाया करते थे
जल में जीवन देखा करते थे , सपनो में इंद्रधनुष बनाया करते थे
जग को अपना माना करते थे , गलतियों को हँस के समझाया करते थे
अंदर की कमींयों को न छुपाया करते थे
कर्म के जो दीपक थे ,समाज के जो सेवक थे
वो गुम हुए , या कहीं सोये है , रास्ता भूल गए, या रात के गुलाम हो गए
सत्य पुकारता उनको गलियों में , भूखे बच्चो की सिसकियाँ उन्हें बुलाती है
सत्याग्रह आंदोलन याद करता है , सीमा पर जवान पूछता है
विपक्ष की हार उन्हें बुलाती है , सत्य पर हर वार बुलाता है
मानवता का हार बुलाता है , भारत बुलाता है