अनुभव का अंतर
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अनुभव का अंतर
अकस्मात निर्णय हुआ, और पहला ख्याल की बुरा हुआ ,जहाँ हूँ वहीँ पास के एक ऐतिहासिक शहर में दो दिन घूमने का निर्णय आखिर कितना बुरा हो सकता था , जब वह परिचितों के साथ बनाया गया हो। तो परिचित व्यक्ति अपने एक मित्र के साथ पहले ही निर्णय क्र चुके थे मगर काम की व्यवस्तता के चलते वह टाल रहे थे ,और मुझसे जाने का आग्रह किया ,शुरुआत में तो कुछ बोल नहीं सका सिवाय हामी भरने के ,मगर बाद के बातचित में स्पष्ट कर दिया की यह संभव नहीं हो पायेगा। मगर फिर बाद में उनके प्लान में परिवर्तन आया और वह स्वयं भी राज़ी हो गए ,तो हम तीनों का झुण्ड चल पड़ा सफर पर। मन में मेरे था कि यह बहुत बुरा सफर होने वाला है ,पर यह भी था यहाँ अकेला कौन सा परम आनंद की अनुभूति हो रही है।
मध्य रात्रि में ट्रैन पहुँची ,उससे पहले टिकट का कुछ कष्ट हुआ मगर थोड़ी सूझबूझ से उसका हल किया गया। स्टेशन पर होटल की तलाश ,बाहर निकल कर होटल की तलाश ,फिर अचानक एक होटल मिल गया ,किराया भी अपने बजट में था , रहने के इंतज़ाम के बाद भोजन की तलाश शुरू हुई ,होटल वाले ने कहा कुछ नहीं मिलेगा इतनी रात यहाँ ,मगर फिर भी हम निकल पड़े ,अगर अकेला मैं होता तो कभी नहीं जाता ,पर साथ होने का यह फ़ायद हुआ और एक स्थान पर भोजन मिल भी गया। फिर रात में नींद आ गई। सुबह फिर होटल वाले से दो ऐतिहासिक स्थल तक जाने का रास्ता पूछ निकल चले ,दूरी जितनी बताई थी उससे अधिक कठिन हुई मगर उसका एक अलग आनंद है। फिर रात को एक भोजन स्थल पर अचानक ही पहुँच गए मगर अनजान राह सही मंज़िल वाली कहवत सिद्ध हुई ,और परम सुख प्राप्त हुआ।
फिर नींद अच्छी आई, अगले सुबह एक झील की सैर और नौकायन का आनंद , फिर एक और नए भोजन स्थल और फिर वापस ट्रैन का इंतज़ार एक नजदीकी बाग़ में। रात तक सभी अपने अपने घोंसले में फिर से क़ैद। पुरे सफर का सफल होना अगले सफर के बुरे होने तक याद रहेगा।
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