दिल यूँ फ़ना हुआ , समय में सना हुआ , खुद के अहंकार से , परिजनों के प्रतिकार से , जल चुकी थी जो घडी , मिल कहीं मुझको कड़ी , याद भी ना रही
आ गयी ऐसी घडी
एक वक़्त से इंतज़ार था , उसे खुद पे इख्तियार था
हवा मिली सो गयी , पास रह के भी खो गयी , हरकते हज़ार बार की , पर्दों के प्यार की , ज़ालिम न तू मेरा दोस्त है , क़ातिलों की रात है , मर चुके है मित्र सब , जल गया चरित्र सब , अब सामने तो आ , छू के जा मुझे , मिल के मुझसे मिला मुझे , ये क्या बात हुयी , कल जो एक रात हुयी , हाथ आकर फिसल गई , गिर कर फिर संभल गयी , मौत को छू आयी थी , सबसे मगर परायी थी , आओ की अब हम चले , दूर जाके सबसे मिले , बड़ी लम्बी ये रात हुयी , कोई मगर न बात हुयी , अपने भी रूठ गए , दूर जाके बैठ गए , सपनो में है ढूंढते , लम्हो को खोजते , क्या मगर ये बात हुयी , हाँ अजीब दिन की भी शुरुआत हुयी, अगर चलने दो ये बात , न बिछ्डेगा साथ ,
अर्ज़ का क़र्ज़ लेकर चला था , हर किसी का दर्द लेकर चला था , क्या हुआ जो कहीं खो गया , सब जा के सो गया ,
रुक रुक के रात गुज़रती है , धीरे धीरे चलती है , सपनो में पलती है
रात की ही बात है , किस्सा एक याद है , सोया था जो एक बार , जगा अचानक आधी रात , क्या हुआ ये चिल्लाने लगा , सपनो में बड़बड़ाने लगा , अपने जागते ही न थे , मुझको मानते ही थे , सब सपने की ही बात है , उस आधी रात की बरसात है , आँखे खुलती ही न थी , पलके उठती ही न थी , कुछ पलो में कुछ हो गया , कहीं दूर जाके सो गया , सब लोग एक पास थे , बैठे उदास थे , पंत प्रकृति आये थे मुझको ये समझाए थे
दुनिया का तू बेटा है
खेल यहाँ छोटा है
बैठा देखता ही रेहगा क्या
कहेगा नहीं , केवल सुनेगा क्या
ये के मिसाल है , बुझी हुयी मशाल है , सब का हाल बदहाल है
एक मेरी मानिये , अपनों को न जानिये , सपनो को पालिये ,
चीखता हूँ , कोई सुनता नहीं
कहता हूँ , कोई सुनता नहीं
बोलता हूँ , कोई सुनता नहीं
हर करम का अंत यहीं होगा , जो है कलंक यही मिटेगा , रोकोगे किसकी कलम , जो है सत्य वही बिकेगा , आकाश निचोड़ के देख लो , परिजनों से पूछ लो , जल की धारा का स्रोत जान लो , कर्तव्य अपना पहचान लो ,
कलंक है तो कहीं न कहीं दिखेगा ही
असत्य है तो कहीं न कहीं छुपेगा ही
नफरत की रस्सी कब तक बनावेगे , प्रेम की तलवार में जंग नहीं लगती
आदत की औकात कब तक दिखावेगे , अनुशासन का प्रहार होगा ही
लो कारण मिल गया झूठ बोलने का , दूर होने का
हाँ , सटीक है बिलकुल सत्य की तरह
विश्वास है जब , सच और झूठ एक दिखते हैं
किसकी कहानी कौन सुनेगा , मेरी ज़बानी कौन सुनेगा , क्या यही माया है
सब के अपने जाल है ,
सब्र की कब्र में बैठा हूँ , अब्र की सब्र में बैठा हूँ
बेचैनियों का जो हाल है , उसका एक ही सवाल है
कौन जिमीदार है , जो तेरा ये व्यवहार है